Monday, 27 February 2017

"मेरे आज़ाद शेर" भाग 'तीन'



                                                      "मेरे आज़ाद शेर" भाग 'तीन'  



एक रौनक़ है आज़कल महफ़िल में मेरे ,
जो देर तलक रहती है
कल शाम तक मातम पसरा था ,
आज़ जशनों  की नुमाइश होती है
महफ़िल में मेरे।

कब तक डरेंगे हम अंधेरों से
रौशनी भी आयेगी एक दिन
जागे तो हम बहुत हैं ,डर-डर के
इन आँखों में नींद भी आयेगी एक दिन।

जिंदगी से माँगा था ,मैंने भी बहुत कुछ
मेरी झोली ख़ाली थी
कुछ पाया ,कुछ खो दिया
ज़िंदगी ही कुछ मतवाली थी।

ज़िंदगी शुरु होने से पहले ख़त्म हो जाएगी
कभी सोचा न था ,
राह चलने से पहले ,मंज़िल खो जाएगी
 कभी सोचा न था।

लोग अक़्सर आते रहते हैं ,मेरी क़ब्र पे
ख़ुशनसीबी है ,
ज़िंदा था कभी मैं भी ,दो पल बातें न हुईं
बदनसीबी है।

चंद पल आये थे मेरे हिस्से
कमबख़्त !ज़िंदगी को नागवारा था
इल्म नहीं इस बेरब्त ज़िंदगी को
कई रातें मैंने, रोकर गुजारा था।

बड़ी मुश्क़िल से
ये लम्हा नसीब हुआ है ,आज़
कुछ लम्हा ही सही
मौत की पहलूं में गुजारा था।

बड़ी-बड़ी बातें किया करता
चौराहों पर बैठ के ,
ख़ुद पे आई तो ,कहता हूँ
मैं तो केवल बंजारा था।

जा रहा हूँ ,दुनियां से
लेक़िन नाम याद रखना ज़ुरूर
निकम्मा ही सही ,छोटा ही सही
तेरे आसमां की काली रातों में ,
चमकता सितारा था।



                                "एकलव्य"
                     

छाया चित्र स्रोत:https://pixabay.com



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