Friday, 23 June 2017

"मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा"

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा
हवाओं को लपेट  के  तू ,  आंधियाँ बना -बना
लहू की  गर्मियों से तूं , मशाल तो जला -जला
जला दे ग़म के शामियां ,नई सुबह तो ला ज़रा
                                                               
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

भूल जा तूँ जिंदगी ,मौत को गले लगा
झूठ की जो लालसा ,मन से तू निकाल दे
सपनों के पुलिंदों को ,कदमों से ठोकर मार दे
क़िस्मत मिलेगी धूल में ,माथे से लगा ज़रा
                                                                                                
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

सोच मत तू है धरा ,पंख तो फैला ज़रा
उड़ जा आसमान में ,विश्वास से भरा -भरा
देख  मत  यूं  मुड़ के  तूं ,  लौटने के वास्ते
क़िस्मत को कर ले तू बुलंद ,कठिन हैं ये रास्ते
बना ले ख़ुद को क़ाबिले ,लोगों के मिसाल की
अमिट लक़ीर खींच दे ,ब्रहमांड में खरा -खरा
                                             
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

व्यक्तित्व बन पहचान की ,अपने को ज़रा -ज़रा
दुनियां गले लगाएगी ,कोटि -कोटि ,धरा - धरा
चक्षुएं   बिछाएगी ,यहाँ -वहां ,  जहाँ  -तहाँ
ईश्वर भी मुस्कुराएगा , देखकर तेरी अदा
वो भी सिर झुकायेगा ,देर ही सही ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

                               "एकलव्य "     


                                           

Thursday, 22 June 2017

''पथ के रज''

गा रहीं हैं,सूनी सड़कें 
ओ ! पथिक 
तूँ लौट आ 
भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता 
नींद से ख़ुद को जगा 

प्रतिक्षण प्रशंसा स्वयं लूटे 
मिथ्या ही राजा बना 
चरणों की , तूँ धूल है  
सत्य विस्मृत कर चला 

क्षणभर की है ये रौशनी 
रात्रि में है दिन दिखे 
माया मिली ये रात्रि है 
जिसमें आकर,जा फँसा 

ललाट पे होकर खींची
जीवन की कटु सच्चाईयाँ 
पोंछना तूँ व्यर्थ चाहे 
भाग्य की अंगड़ाईयाँ 

सड़क से होती शुरू 
अंत होंगी सड़क पे 
जन्म से पीछा छुड़ाता 
मृत्यु ही परछाईयाँ 

रुक पथिक ! मत जा उधर 
नहीं कोई, तेरा यहाँ 
साक्षात्कार सत्य से करातीं 
तेरी ये परेशानियाँ 

महल हैं, दिखावे की ख़ातिर 
पराये वो, तेरे नहीं 
भूलने का प्रयत्न करता 
अपनी अनुपम झोपड़ी 

बच्चे भूखे तेरे भले हैं 
स्नेह से बुलाते अभी 
चूल्हे पर भोजन बनाती 
प्यारी तेरी, अर्धांगिनी
खोज क्यूँ ? जीवन की करता 
अंत है तेरा यही,    

 गा रहीं हैं,सूनी सड़कें 
ओ ! पथिक 
तूँ लौट आ 
भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता 
नींद से ख़ुद को जगा ....... 


"एकलव्य" 








  

Friday, 16 June 2017

"न्याय की वेदी"

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !
लज्ज़ा तनिक 
न तुझको 
हाथ रखे है !
सिर पर 

मैं रंज सदैव ही 
करता 
मानुष स्वयं हूँ 
कहकर  
लाशों के ढेर पे 
बैठा 
बन ! निर्लज्ज़ 
तूँ मरघट 

स्वर चीखतीं ! हरदम 
मेरे श्रवण से होकर 
हिम सा ! द्रवित 
हृदय होता है
 शोक की 
ऊष्मा पाकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !

सुनकर ! अनसुनी 
करता 
क्यूँ ? आवेश में 
आकर 

सुन ले ! नश्वर 
ओ ! मानव 
अंत भी तेरा 
निश्चित 
काल समीप है 
तेरे 
बन ! छाया सा 
दानव 

जो आज हैं 
चीथड़ों में लिपटे 
कल वे भी 
मारे जाएंगे !
तूँ राजवस्त्र ! पहनता 
वे तुझको भी 
दफ़नायेंगे !

तूँ क्यूँ ? माटी से 
बचता 
कलंक है माटी 
कहकर 
कलंकित होगा 
पवित्र ! शरीर 
इसी कलंक में 
मिलकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !

पाषाण बिछेंगे ! तुमपर 
सिर से छाती पर 
होकर 
पशु रौंदेंगे ! तुझको 
पथ सामान्य 
समझकर 
घास उगेंगे ! तुझपर 
मेरा डेरा है 
कहकर 
संसार करेगा ! विस्मृत 
कटु इतिहास 
समझकर 
पीड़ित तुझको ही 
कोसेंगे !
घूँटें जल की 
पी-पीकर 

मैं भी गुजरूंगा ! तेरी 
सूनी गलियों से 
होकर 
मुस्कान के व्यंग 
चलाऊँगा ! तेरे 
कर्मों पर 
हँसकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !



"एकलव्य" 

Saturday, 10 June 2017

"कालनिर्माता"

स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी ये इकाई ही हमारे विक्राल शरीर का मूलभूत आधार है जिस प्रकार हमारे राष्ट्र का मूलभूत आधार 'किसान' ! परन्तु  आज उसी अन्नदाता की अनदेखी देश कर रहा है जो न्यायोचित नही,भविष्य में इसके विध्वंसक परिणाम होना तय है यदि हम नहीं चेते ! उस ईश्वररूपी संसार पालक को उसका हक़ नहीं दिया ! देश अपनी बर्बादी का स्वयं जिम्मेदार होगा। धन्यवाद 

"एकलव्य" 


 रे ! मानव

तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा
ब्रह्माण्ड जो तेरा
रचते हैं
पृथ्वी की काया
गढ़ते हैं !
सम्मान, तूँ उनका
तौल रहा

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा

मृदा स्वर्ण ! बनायें
कण से
फल जो हल का
लगायें ! तल में
पाषाण खोद ! उठायें
कर से
क्यूँ ? उनका हक़
छीन रहा
जीवन है, उनका
दीन बना

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा

पाता चैन तूँ
चार-चौबारी
वे घूमें हैं !
क्यांरी-क्यांरी 
खड्ग पहन तूं
चला ! शौक़ से
मूँछ ऐंठता ! बड़े
रौब से
वस्त्र नहीं, उनके
तन लगते
नग्न पाँव ना
चप्पल सजते

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  

सांय-प्रातः तूँ 
दीप जलाये 
छप्पन भोग 
पत्थर को लगाए 
विश्व पुरोहित स्वयं 
कहाए !
नहीं अन्नोत्पत्ति 
क्यूँ ? दायित्व तुम्हारा 
मिथ्या ज्ञान तूँ , व्यर्थ 
बघारे  !
बता नीच उन्हें 
बारी-बारी 

स्वयं उच्च 
बना ! बैठा है 
मृदा धूषित 
उनकी लाचारी  

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  

जाग ! तनिक 
तूँ, जग निर्माता 
लगा गले ! जो 
अन्न का दाता 
दे ! सम्मान, जो 
हक़ उनका है  
बना उनको ही 
भाग्य विधाता !

नहीं काम,आयेंगे तेरे 
वेद ! पुराण,क़ुरान व गीता 
जब क्षुधा,उदर में 
नाचेगी !
बन जाएगा ! क्षण में 
माटी, आह ! जो 
उनकी जागेगी !

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  



"एकलव्य" 
  

Monday, 29 May 2017

"प्राणदायिनी"

वो दूध पिलाती 
माता !
वो गले लगाती 
माता !
कोमल चक्षु में 
अश्रु लेकर 
तुझे बुलाती 
माता !

वो जग दिखलाती 
माता !
तुझको बहलाती 
माता !
तेरे सिर को 
हृदय लगाये 
ब्रह्माण्ड समेटे 
गाथा !

रोती सड़क पे 
माता !
जिसको छोड़ा 
तूने कहकर 
अब तेरा 
भाग्य ! विधाता 

स्मरण नहीं क्या ? तुझको 
आता !
ईश्वर का स्पर्श थी 
माता !
हुआ आज मन 
कलुषित ! तेरा 
कहता, तुझमें 
दरिद्र समाता !

लालचवश है 
बोझ ! बताता 
गृह तेरा संकीर्ण 
हुआ रे !
बूढ़ी माँ को 
व्यर्थ रूलाता !

देख ! तनिक तूं
नयन में उसके 
तीनों लोक है 
माता !
क्यूँ ? करता,फेरे 
मंदिर-मस्ज़िद के 
अनुपम ! ख़ुदा 
बुलाता 

रे ! पापी 
निर्लज्ज तूँ मानव
तुझको कुछ नहीं 
आता !
ईश्वर की,स्वर्ग सी 
भेंट है वो !
जिसको तूँ 
बिसराता 

मुक्ति मार्ग ! की 
इच्छा करता 
मन, वन-वन 
भटकाता 
देख ! वही है 
ज्ञान पुंज,
जिसको देख 
न पाता 

बिन उसके 
दुनियां में कौन ? रोटी 
तुझे खिलाता 
प्राणदायिनी ! जननी वो 
तूँ जिसको, ठुकराता 

हे ! मानव 
तूँ देख ! तनिक 
जीवन, प्राण-पिपासा 
तेरी प्यारी 
माता !   

वो दूध पिलाती 
माता !
वो गले लगाती 
माता !


                          "एकलव्य"                                                    

    

Monday, 22 May 2017

''विजय पताका''

वे शहद 
चटातें हैं !
तुमको 
मैं नमक 
लगाता हूँ !
तुमको 

वे स्वप्न 
दिखाते हैं !
तुमको 
मैं झलक 
दिखाता हूँ !
तुमको 

वे रंग लगातें हैं !
तुमको 
मैं रक्त 
दिखाता हूँ !
तुमको 

गर्दन पर चाकू 
मलते हैं ! वे 
मैं बलि 
चढ़ाता हूँ !
तुमको 

झांसे में रखते ! वे 
प्रतिक्षण 
मैं सत्य 
दिखाता हूँ !
तुमको 

आह्लादित करते ! वे
पल-पल 
निर्लज्ज बनाता हूँ !
तुमको 

विस्मृत कराते !
शक्ति तेरी 
मैं स्मरण  कराता हूँ !
तुमको 

वे मौन बताते !
सभ्य ज्ञान 
उदण्ड बनाता हूँ !
तुमको 

तुझमें रचते ! वे 
नीति कूट 
मैं रण में लाता हूँ !
तुमको 

शस्त्र त्याग ! तूँ 
हे ! अर्जुन 
उपदेश बताते ! वे 
तुमको 
करता हूँ ! मैं 
शंखनाद 
महाभारत रण लाता 
तुमको 

उठ जा ! हे 
तूँ,मानव पुत्र 
रथ में बैठा ! मैं 
तेरे साथ 

तूँ देख ! अनोखा 
लक्ष्य अडिग 
भेद उसे तूँ ! कर 
प्रहार 

उत्पन्न करेंगे ! विघ्न बड़े 
शत्रु सदैव ही 
शत-शत बार 

नाश करेगा ! स्वयं 
शौर्य से 
कूट रचित 
शत्रु जंजाल 

फहरायेगा ! 'विजय पताका' 
राष्ट्र नहीं 
ब्रह्माण्ड ! विशाल 

अविस्मरणीय होगी 
कीर्ति तेरी 
पाँव पड़ेंगे 
धरा ! महान 


"एकलव्य" 

Saturday, 20 May 2017

"मुक्ति मार्ग"

इस लोक में
जन्मा !
अज्ञानी
कूट छिपा
मैं
अभिमानी !
सुन्दर तल हैं
'कर' के मेरे
जिनसे करता हूँ
नादानी !
समय शेष है
अहम् का
मेरे
भ्रमित विचरता !
माया वन
में
भ्रम रूपी मुझे
हिरण दिखे है
स्वप्न दिवा की
बात कहे है
काक मुझे
कोयल
प्रतीत हो !
कर्कश वाणी
अमृत ! वर्षा के
मान स्वर
दिन-रात
पिये हो
सत्य प्रतीत हो
दुर्जन मेरा
काल ! बुलाऊँ
बना ! सवेरा
मोहिनी के
मंदिरा ! का
प्यासा
गढ़ूँ ! मिथ्या
सुन्दर
अभिलाषा !
ज्ञानी को मैं
मूर्ख
बताऊँ !
बता स्वयं
ज्ञानी
कहलाऊँ
मधुशाला ! अब
बना है
मंदिर
करूँ मैं
अपना
आत्म समर्पित !
आत्मोत्सर्ग की 
पराकाष्ठा 
ख़ूब ! बनाऊँ 
उन्मुख होकर 
घर बैठी 
अर्धांगिनी रोये !
बुझा-बुझा के 
मुझको सोये 
रात्रि भए हो 
किवाड़ बुलाऊँ !
अर्द्ध निद्रा उसे 
जगाऊँ 
जिह्वा खोले !
छला बताऊँ 
स्वयं को मैं 
रणवीर बनाऊँ 
सांय-प्रातः ! मैं 
रोज कमाऊँ 
मधुशाला ! में 
ख़ूब लुटाऊँ
पी-पीकर 
मरणासन्न ! 
जाऊँ 
यही मुक्ति ! मैं 
मार्ग 
बताऊँ 


"एकलव्य" 

Saturday, 13 May 2017

"मुर्दे !"


 प्रस्तुत रचना "इरोम चानू शर्मिला"(जन्म:14 मार्च 1972)को समर्पित है जो मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जो पूर्वोत्तर राज्यों में लागू सशस्त्र बल विशेष शक्तियां अधिनियम, १९५८ को हटाने के लिए लगभग १६ वर्षों तक (4 नवम्बर 2000 से 9 अगस्त 2016 भूख हड़ताल पर रहीं। धन्यवाद , "एकलव्य" 


मैं हिला रहा हूँ 
लाशें !
मैं जगा रहा हूँ 
आसें !

उठ जा ! मुर्दे 
तूँ क़ब्र 
तोड़ के 
मैं बना रहा हूँ 
खाँचें !

मैं हिला रहा हूँ 
लाशें !
मैं जगा रहा हूँ 
आसें !

मुर्दे तूँ 
झाँक ! क़ब्र से अपनी 
जिसमें लिपटा 
तूँ ,आया था 

नोंच रहें हैं 
वे दानव 
तूँ ,जिन्हें 
छोड़कर आया था 

रक्त ! जो पीछे 
हैं तेरे,
तूँ जिन्हें भूलकर 
आया था 

पात ! वो उनका 
करतें हैं 
तूँ ,जिन्हें 
सौंपकर आया था 

चैन तूँ ! क़ब्रों में 
लेता है 
बेचैन ! उन्हें 
वे करते हैं  

मैं हिला रहा हूँ 
लाशें !
मैं जगा रहा हूँ 
आसें !

अरे ! बेग़ैरत 
उठ जा ! पलभर 
को तूँ 
मुर्दे ! तूँ नहीं 
सुनता क्यूँ ?
हो निर्जीव ! सा
लेटा क्यूँ ?

खातें हैं,वो 
तिल-तिल 
हमको !
तूँ 'नींद की गोली'
खाता है !
गाते प्रेम के 
गीत हैं वो ! तूँ 
साँय!साँय! 
चिल्लाता है 

मैं हिला रहा हूँ 
लाशें !
मैं जगा रहा हूँ 
आसें !

तूँ सन्नाटों  में 
पसरा है !
वे पसरे ! चढ़कर 
छाती पे 
परतंत्र तूँ लेटा 
क़ब्रों ! में  
वो छुरा घोंपते !
थाती में 

मुर्दे ! तूँ हिल जा 
थोड़ा 
क्रांति की आस 
जगा ! थोड़ा 
सो जाना !
फिर से जाकर, 
उनको 
शमशान ! तूँ 
ला ! थोड़ा 

मैं हिला रहा हूँ 
लाशें !
मैं जगा रहा हूँ 
आसें !


"एकलव्य"


व्यक्ति परिचय स्रोत : विकिपीडिया

Tuesday, 9 May 2017

"जूतियाँ !"


प्रस्तुत 'रचना' उन पूँजीपतियों एवं धनाढ्य वर्ग के लोगों के प्रति एक 'आक्रोश' है जो देश के प्राकृतिक स्रोतों एवं सुख-सुविधाओं का ध्रुवीकरण करने में विश्वास रखते हैं। मेरी रचना का उद्देश्य  किसी जाति,धर्म व सम्प्रदाय विशेष को आहत करना नही है ,परन्तु यदि कोई व्यक्ति  इस रचना को  किसी जाति,धर्म व सम्प्रदाय विशेष से जोड़ता है तो ये उसके स्वयं के विचार होंगे। धन्यवाद "एकलव्य"     

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

सिंहासनों पे
वे हैं बैठे !
सिर झुकाना
गर्व तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

पालकी में
वे हैं ऐंठे !
काँधे लगाना
कर्म तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

शताब्दियों से
दास था ! तूं
बोझ उठाना
मर्म तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

भाग्य में !
चोंटें लिखी हैं
नमक छिड़कना
शर्त तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

आज़ादी हो !
या ग़ुलामी
भाग्य ही,अब
ज़ख्म तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

उतारेंगे ! वो
तेरी खालें
मूक होना
रंज तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

हल चलाता !
छातियों पे
स्वर्ण उगाना
कर्तव्य तेरा !

काटेंगे ! वो
स्वर्ण तेरे
खूटियाँ हैं
मर्ज़ तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

कुचलेंगे !
सीने,तुम्हारे
उनकी विरासत
भाग्य तेरा !

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

अन्न ! छोड़
जल भी नही है
पीने को
बस,रक्त ! तेरा

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !

मलिन ! ही
जन्मा जगत में
गलियों में है
मरण ! तेरा

भाग्य ! तेरा
कर्म !तेरा
मर्म में
लिपटा  हुआ
चिरस्थाई
अक़्स ! तेरा

जूतियाँ !
मैली-कुचैली
सिर पे रखना
धर्म तेरा !


"एकलव्य"
  







Tuesday, 2 May 2017

"देख ! वे आ रहें हैं''

पाए हिलनें लगे !
सिंहासनों के,
गड़गड़ाहट हो रही
कदमों से तेरे,

देख ! वे आ रहें हैं........

सौतन निद्रा जा रही
चक्षु से तेरे,
हृदय में सुगबुगाहट
हो रही,

देख ! वे आ रहें हैं........

भृकुटि तनी है ! तेरी
कुछ पक रहा,
आने से उनके
कुछ जल रहा
मनमाने से उनके,

देख ! वे आ रहें हैं........

वे नोंचकर ! खाने लगे
लिपटे चीथड़ों में
अरमान सारे,
पी रहें ! वो लहु तुम्हारे
ग़ैरत जिसमें, है मिली
फुसला रहें !

देख ! वे आ रहें हैं........

धूल-धूषित कर दिया
तुझमें बची जो अस्मिता
चौराहों पे बैठे
खिल्ली उड़ा रहें !

देख ! वे आ रहें हैं........

जीवित ही तुझको
मृत किया !
मृत हुए, संसार में
लानतें भिजवा रहें !

देख ! वे आ रहें हैं........

मृत्यु शैय्या,तेरी सजी
फूल वो बरसा रहें !
झूठ के कांधों पे रखकर
अर्थी तेरी, उठा रहें !

देख ! वे आ रहें हैं........

कर रहें ! विलाप मिथ्या
देखकर तेरी ये हालत
ज्ञात ! उनको नोंचना
क्षत-विक्षत शरीर को
गिद्ध सा मंडरा रहें !

देख ! वे आ रहें हैं........


"एकलव्य"      

Thursday, 27 April 2017

"चंद ख़्याल मेरे"

अब आ रहा है चैन 
क्यूँ जागूँ ? तूँ बता 
कल ही अभी सोया हूँ 
ख़लल डालूँ,तूँ बता !

         ⧪

बेच ही रहें हैं 
तो बेचने दे !
आख़िर कफ़न उनका है 
मैयत भी उनकी !

          ⧪

वो नाचतें हैं,सिर पे !
जाग जाऊँगा 
वो खाते हैं,ज़िस्म को !
ख़ौफ खाऊँगा 
मसलन इंसान ही हूँ !
ख़ाक में मिल ही जाऊँगा 

           ⧪

वो बनायेंगे !
भस्म से मेरे 
कई बर्तन !
थोप देंगे,
रंगों के अंजुमन 
मिट्टी ही हूँ 
जैसा चाहो !
ढल ही जाऊँगा 

           ⧪

डर लगता है !
पानी को छूने से 
कुछ तलक इंतज़ार कर ले !
आहिस्ता-आहिस्ता 
गल ही जाऊँगा !

           ⧪

आये कई शख़्स !
ख़्याल पेश करने वाले 
मैं भी आया हूँ, 
कुछ वक़्त ठहर जा !
दिल में उमड़ते अरमां 
कह ही जाऊँगा !

            ⧪

कहूँगा दो लफ़्ज !
शब्द नहीं रखता कोष में 
गहराईयाँ होंगी,ख़्यालों में 
पलभर में उतर ही जाऊँगा !

             ⧪

कुछ लोग लगायेंगे तोहमत 
मेरी क़लम की स्याही पे, 
सोच हूँ !
अपनी धुन का,
मौका मिला तो !
क़हर ढुङ्गा ,

            ⧪

याद आऊँगा !
बीते ज़माने को 
ज़र्रा ना बचेगा 
जमीं पर 
राख़ हूँ !
राख़ में मिल जाऊँगा .........  



''एकलव्य"









Sunday, 23 April 2017

''कीर्ति स्तम्भ''

हिमालय के मैं गोद में
था सुषुप्त सा,रौद्र में
हिम पिघलती जा रही
पीड़ा बन,आवेग में

कोई पूछे ! क्यूँ पड़ा है ?
मृत हुआ सा,सोच में
देख ! किरणें फूटतीं हैं
घाटियों के मध्य में

उठ ! खड़ा,तनकर यहाँ
उपदेश सा तूँ, रूप में
कर प्रस्फुटित ! विचार तूँ
निर्जरा संसार में,

देख ! वो जो आ रहा
वायु सा,यूँ वेग से
विस्तार दे ! हथेलियों को
लांग जा ! अम्बर तले

मुड़ नहीं ! तूँ ,देख मत !
काली वो,परछाईयाँ
केवल निराशा लायेंगी
जलते से दीपक तले

बल ! जो तेरे पंख बैठा
झाड़ ले !उसको अभी
प्रत्यक्ष अब,तुझको दिखेगा
संसार भी,चरणों तले

शक्ति बन !जो तूँ उड़ेगा
मारुति के रूप में,
पुष्प की वृष्टि करेंगे
बन उपासक,देव भी

दीप्तिमान ब्रह्माण्ड होगा
तेरे 'कीर्ति स्तम्भ' से ....



"एकलव्य"



        

Friday, 14 April 2017

"मत कर ! गर्व तूं इतना"

मत कर ! गर्व तूं इतना
संविधान भाव बनाया मैंने 
स्नेह से इसे सजाया मैंने 
संवेदनायें पल-पल पल्लवित होंगी 
स्वप्न तुझे दिखलाया मैंने। 

मत कर ! गर्व तूं इतना 

उड़ा विद्वेष था आसमान में 
प्रेम धरा पर लाया मैंने
स्वर्ण अक्षरों में अंकित होता 
मानव धर्म सिखाया मैंने। 

मत कर ! गर्व तूं इतना 

लोहा लिया था मैंने जग से 
जग का कोप उठाया मैंने 
वे करते थे निंदा मेरी 
स्नेह से गले लगाया मैंने। 

मत कर ! गर्व तूं इतना 

देश अलग-थलग सा लगता 
इसको एक बनाया मैंने 
करते कुछ थे जाति की बातें 
जाति,जाती सिखलाया मैंने। 

मत कर ! गर्व तूं इतना 

स्नेह धर्म का बीज था बोया 
'संविधान' वट लगाया मैंने 
पुष्पित थीं शाखायें जिनकी 
नया भविष्य जो लाया मैंने।

 मत कर ! गर्व तूं इतना 

प्यार नहीं था वर्ण-विशेष से 
दुःख बटवारे का पाया मैंने 
पूजते हैं ईश्वर मानकर 
कदापि नहीं बतलाया मैंने।

मत कर ! गर्व तूं इतना 

शेष है मेरी अंतिम इच्छा 
करो ! ग्रहण संविधान की शिक्षा 
मत पूजो ! भगवान मानकर 
कभी नहीं  था चाहा मैंने। 

मत कर ! गर्व तूं इतना 

विराम लगाओ ! धर्म-जाति पे 
भेद-भाव और वर्ण,ख्याति पे 
वरन करो !इंसान धर्म के 
अंतिम शब्द बतलाया मैंने। 



भीम हूँ,मैं 
तेरे माटी का
नहीं चाहता,ख्याति स्वाद !

शेष यही है,इच्छा मेरी
पुनर्जन्म,
जीवन सनात ! 

( "युग पुरुष" बोधिसत्व,भारतरत्न विभूषित  बाबा साहेब  डॉ. भीमराव अम्बेडकर को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।)    



            "एकलव्य"  

छाया चित्र स्रोत: http://www.culturalindia.net
    

Friday, 7 April 2017

"बुलबुला"

हृदय में उठता बुलबुला 
हताशाओं से, फट रहा 
लिख दूँ क्रांति ! लेखनी से 
मन ये मेरा कह रहा

लेकर मशालें हाथों में 
सुबहों निकलता नित्य हूँ 
जाग जा ! तूँ ऐ वतन 
काल तुझसे कह रहा 

लूटतें हैं ! भेड़िये 
मिलकर,अस्मिता देश की 
पा रहा तूँ,चैन क्यूँ ?
कराहती अंतरात्मा 

सुन तनिक ! तूँ चल सही 
एकांकी नहीं,इस धरा 
धैर्य रख, वो आयेंगे !
देर ही सही,ज़रा 

दरक़ार है, चिंगारी की 
पत्थरों को घिस ! अभी 
क्रांति की ज्वाला जलेंगी  
करतलें फैला ! ज़रा 

स्वीकारता हूँ,सत्य को 
खड़ा अकेला,आज तूँ 
न्याय की वेदी पे ख़ुद को 
क्षणमात्र,चढ़ा ! ज़रा 

फूँक दे ! विश्वास की 
जो चेतना,सोई हुई 
विश्व  होगा साथ तेरे 
युग चिरस्थाई,ला ! ज़रा 


"एकलव्य"   


     

Saturday, 1 April 2017

"अंतिम गंतव्य,बाक़ी"


                                                   
स्वतंत्र भारत हो गया 
केवल स्मृतियाँ बाक़ी 
महान सागर,सूख चला 
मृत हुईं सीपियाँ बाक़ी। 

बन गईं खाईयाँ हृदय में 
कलुषित द्वेष बाक़ी 
ढोंगी धर्म पल्लवित 
दुर्बल ! सत्य बाक़ी। 

देशप्रेम भूला, 
सम्प्रदाय बाक़ी 
रचनायें हों चली धूमिल 
बनकर दिवास्वप्न सा, 
गहराता विध्वंस बाक़ी।  

करता है मृत सा मानव 
झूठा प्रदर्शन धर्म का !
कलंकित किया,इंसान धर्म 
इंसानियत सा स्वप्न बाक़ी। 

क्रांतिकारी कहलाते थे,देश पे मरने वाले
मरने वाले कहलाते,देशद्रोही आज
प्राप्त हुई आज़ादी का 
बस यही,एक मर्म बाक़ी। 

सत्य से ईर्ष्या करने लगे 
सत्य बोलने वाले, 
वर्तमान में आत्मविस्मृत सा 
यही एक तथ्य बाक़ी। 

बाक़ी तो बहुत कुछ है,लिखने को 
लेखनी में एक आख़िरी बूँद 
रह गई स्याही की, 
अंदर उद्वेलित भावनायें बाक़ी 

कहने को,
उठो  !
जागो ! 
खड़े हो! 
चल पड़ो !
मंज़िल दूर नहीं,
क्षितिज़ के पार है जाना 
केवल अंतिम,गंतव्य बाक़ी। 


                "एकलव्य"
 अंतिम गंतव्य,बाक़ी

Monday, 27 March 2017

"भावनायें बनकर"


                                                                "भावनायें बनकर" 


गिर गईं भावनायें बनकर 
जो टिकीं, पलकों तले 
बहुत रोका हथेलियों से दबाकर 
स्याह बन गईं हाथों में आकर 

बड़े-बड़े ख़्वाब देखा करता 
आसमां की ओर निहारकर 
हों गईं ओझल यूँ 
सपनों सी नींदों से  जागकर 

आँखें आज भी धोता हूँ 
अश्क छुपाने के लिये 
दुनियां वाले जान लेते हैं इन्हें 
मायूस चेहरे के धोखे में आकर 

लिख तो रहा हूँ आज भी मैं 
दिनों-रात एक ही ख़्याल 
बदल जाते हैं शब्दों के फेर से 
लेखनी के मुहाने पे आकर 

प्रश्न तो ये है 
लिख पाऊँगा अपने विचार कभी 
या स्याही ही उछालता रहूँगा
पन्नों पे केवल लीपापोती में 

फिर भी कोशिश तो सदैव बनी रहेगी 
प्लवन करती इच्छाओं को उतारने की 
कोरे कागज़ की जमीं पर 
झूठी सी इस दुनियां में 
थोड़ी देर आकर 


"एकलव्य"  



Thursday, 23 March 2017

एक सलाम 'अमर शहीदों' के नाम


                                                      एक सलाम 'अमर शहीदों' के नाम 


उगते सूर्य की किरणों जैसा 
दृढ़ निश्चय सा था वो 
आसमान में उड़ता खग था 
पृथ्वी पर जन्मा था जो 

स्वर में भरा आज़ादी का जज़्बा 
निष्कलंक सा था वो 
नंगी पीठ प्रतीक्षा करतीं 
भयविहीन सा था जो 

लहु में बहतें स्वतंत्रता के कण 
स्वतंत्रता का प्रहरी था वो 
हृदय में बसता एक स्वप्न  
देशस्वप्न सा था जो  

विस्मृत करता देश आज है 
अविस्मरणीय व्यक्तित्व सा था वो 
नाम था जिसका 'भगत सिंह'
सिंह सदृश्य सा था वो 
सपूत देश का था जो ......... 

एक सलाम 'अमर शहीदों' के नाम 

"एकलव्य"   

Tuesday, 21 March 2017

"आओ प्यारे"

                                       

                                                     "आओ प्यारे" 
प्यारी कविता 'देश' के नाम 


रहने दो!
मंदिर,मस्ज़िद ,गुरुद्वारे 
बात करो,इंसान की प्यारे 
मत बाँटो,हमें पृथक धर्म में 
नष्ट करो! बस द्वेष हमारे 

अच्छे लगतें, घण्टें मंदिर के 
अज़ान, कर्णप्रिय लगता है 
क्या होली,क्या ईद देश में 
प्रेम  प्रबल जल बहता है

भाँति-भाँति के फूल खिलें हैं 
उत्तर से दक्षिण में सारे 
ना रोको तुम,धार प्रेम की
बननें दो! यूँ हृदय हमारे

प्रथम नागरिक,भारत का मैं 
जाति-धर्म सब पीछे हैं 
देश महान,बस बने हमारा 
रहने दो !सौहार्द हमारे

दूर करो ! समीकरण धर्म का 
इंसान का पाठ पढ़ाओ प्यारे
गणित का खेल,बड़ा पेचीदा 
मानव कला, सिखाओ प्यारे

देश जो लगता अलग-थलग सा 
मिलकर एक बनाओ प्यारे 
बची रहे,अस्मिता देश की 
प्रहरी बन,जान लड़ाओ प्यारे  
   
सूरज प्रगति का लाओ प्यारे 
एक बनें हम,आओ प्यारे 
स्वर्णकाल तुम, लाओ प्यारे 
प्रेम गीत सब, गाओ प्यारे। ....


'जय भारत' 


                                 "एकलव्य"
 प्यारी कविता 'देश' के नाम

छाया चित्र स्रोत: https://pixabay.com
           

Sunday, 19 March 2017

"गिर जायेंगे,ये ढेर बन"


                                                   "गिर जायेंगे,ये ढेर बन"
 "गिर जायेंगे,ये ढेर बन"



इन आँसुओं से सींच दूँ मैं 
हो कोई सपना अगर 
थाम लूँ,मैं बाजुओं में 
हो कोई अपना मग़र, 

आशायें धूमिल हों चुकीं जो 
आँखों में थीं,तैरतीं 
गिर जायें बनके,गम की बूंदे 
सजल चक्षु,हो मगर

चाहता हूँ,मैं भी उड़ना 
पंखों के,दम पे मगर 
दिख जाये कोई रास्ता 
गंतव्य सत्य का, हो अगर

रोना नहीं मैं चाहता 
भावनाओं के,वशीभूत बन 
माया में लिपटी ज़िंदगी 
ढूंढे खुशी क्यों !हर नगर,

सपनें खड़ें हैं,रेत पर 
ना जानें,क्या ये सोचकर
ज्ञाता नहीं,मैं सत्य का 
गिर जायेंगे,ये ढेर बन।.....गिर जायेंगे,ये ढेर बन।.....


                      "एकलव्य"
 "मेरी रचनायें मेरे अंदर मचे अंतर्द्वंद का परिणाम हैं"  
छाया चित्र स्रोत :https://pixabay.com/

Thursday, 16 March 2017

"जाति-धर्म का ध्वज" 'लेख'


                                             "जाति-धर्म का ध्वज" 'लेख'   


सर्वप्रथम मैं कहना चाहूँगा,हम मात्र इंसान हैं,न कि किसी विशेष धर्म-जाति के परिचायक।
धर्म-जाति का ध्वज वही व्यक्ति ऊँचा करता है जिसका कुछ स्वयं का स्वार्थ अन्तर्निहित हो,यदि आप विज्ञान और प्रौद्योगिकी की बात करतें हैं,तो ये उन स्वार्थपरक जन के लिए एक टेढ़ी खीर हो जाती है क्योंकि विज्ञान तर्क एवं स्पष्ठ प्रमाणों का द्योत्तक है,जो धर्म-जाति के आधार पर उत्पन्न तर्कों को निराधार सिद्ध करता है। 

मानव का एक सारभौमिक स्वभाव है, "सरलता की ओर अग्रसर होना बिना किसी कठनाई के" तो क्यों जटिलता से परिपूर्ण बातें करे ? 
"धर्म एक सीधा व सरल मार्ग है और सरलता का मार्ग प्रारम्भ में उचित प्रतीत होतें हैं किन्तु इसके दूरगामी विध्वंसक परिणाम तय हैं।" लोगों के ह्रदय में व्याप्त जाति-धर्म के नाम पर विद्वेष ,परिणामस्वरुप विनाश एवं गहरे शोक का प्रारम्भ !
संभव है विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के दौर में हम कितनी भी सफलतायें अर्जित कर लें किन्तु विचारों से आज भी हम धर्म एवं जाति की दासता से मुक्त नहीं हो पायें हैं। 
"अतः हमें तर्क आधारित तथ्यों पर अमल करने की आवश्यकता है।" 


                                "एकलव्य"
 "मेरी रचनायें मेरे अंदर मचे अंतर्द्वंद का परिणाम



छाया चित्र स्रोत :  https://pixabay.com/

"हाँ,मैं मन हूँ"


                                                 "हाँ,मैं मन हूँ"
 "हाँ,मैं मन हूँ" 


हाँ मैं मन हूँ 
मानव का करतल हूँ 
आत्मा से द्वेष रखता  
चिरस्थाई महल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ....... 

प्राणी को उद्वेलित करता  
बनके सवेंदनायें,प्रबल हूँ 
बन अशक्त जो बैठा प्राणी 
प्रस्फुटित करता तरंग हूँ
हाँ,मैं मन हूँ....... 

मृत हुई जो तेरी इच्छा 
प्राण फूँकता,नवल हूँ 
भरता हूँ,चेतना की लहरें 
प्रेरणा एक,सबल हूँ
हाँ,मैं मन हूँ....... 

कोई कहे मैं,विचलित होता  
माया रूपी,छल हूँ  
कहते कुछ,पाखंडी मुझको 
दिवास्वप्न में,खल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ.......

विचलित सारथी,तूँ रथ का 
केवल मैं तो,चल हूँ 
मैं कहता,श्रीमान आपसे 
मानव का संबल हूँ 
हाँ,मैं मन हूँ.......हाँ,मैं मन हूँ.......



                      "एकलव्य"
"मेरी रचनायें मेरे अंदर मचे अंतर्द्वंद का परिणाम हैं"  
 
छाया चित्र स्रोत :https://pixabay.com/

 

Wednesday, 15 March 2017

"तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'पाँच'


                                                   "तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'पाँच' 
 "तैरतीं ख़्वाहिशें"



आज़ मैं फिर सपनें देखता हूँ 
आज़ फिर,दिल को सेंकता हूँ 
आज़ फिर वही,मेरी महफ़िल सुनसान 
आज़ फिर वही ,मेरी दुनियां वीरान,

आज़ फिर जहन में वो ख़्वाहिश 
आज़ फिर मेरे सूने आँगन में ,एक नई फ़रमाईश 
आज़ फिर वही होंठों पर आते-आते,लफ्ज़ों का रुकना 
आज़ फिर वही,रुके हुए अल्फाज़ों का होंठों से फिसलना,

आज़ फिर वही,दिल की अधूरी चाहत 
आज़ फिर वही,दिल को थोड़ी सी राहत 
आज़ फिर दिल का फिसलना,एक अज़नबी से रुबरु होकर 
आज़ फिर गिरते-गिरते संभलना,अंजानी राहों से होकर,

आज़ फिर वही,ज़ालिम ज़मानें का फ़ब्तियाँ कसना 
आज़ फिर वही न चाहते हुए भी,लोगों को अनसुनी करना,

आज़ फिर वही,अनजानी महफ़िल में शामिल होना 
आज़ फिर वही,अकेली रातों में कुछ गुनगुनाना,

आज़ फिर वही,अपने चौबारों से लोगों को देखना 
आज़ फिर वही,अनजाने अपने को देखकर दिल का धड़कना,

आज़ फिर वही,इस पागल दिल को समझाना 
आज़ फिर वही,अपने ख़्वाहिशों को फुसलाना,

आज़ फिर वही,गहरे ख़्यालों में डूबना 
आज़ फिर वही,सतह पर उतराना,

आज़ फिर वही,अंधेरे बंद कमरों में चीखना 
आज़ फिर वही,अकेले में यूँ ही बड़बड़ाना 
आज़ फिर वही,जी भर रो लेना 
आज़ फिर वही,निकलते आँसूओं को अपने गर्म हथेली से पोंछना 
और हँसने का झूठा नाटक करना
आज़ फिर वही दूर तक,अकेले ही निकल जाना,

आज़ फिर वही,मैख़ानों में ज़िंदादिली का एहसास 
आज़ फिर वही,लफ्ज़ों पर अधूरी सी प्यास,

आज़ फिर वही,पीकर दुनियां को भुलाना 
आज़ फिर वही,पीने के बाद उनकी याद आना 
आज़ फिर वही,मैख़ानों में अज़नबियों से बातें 
आज़ फिर वही,याद आईं उनके पहलूँ में बीतीं रातें,

आज़ फिर वही,बोतल पे सिर रखकर रोना 
आज़ फिर वही,अपने होशों-हवाश खोना,

आज़ फिर कहीं,गलियों के नालों पर बेसुध पड़ा होना 
आज़ फिर वही,किसी अज़नबी का सहारा लेना,

आज़ फिर वही,अंधेरे कमरे में पड़े-पड़े उनकी याद में रोना 
आज़ फिर वही,अकेले रोते-रोते सोना 
ज़ारी है,आज़ भी 
कल भी
ज़ारी रहेगा अंतिम साँसों तक। बस तेरी याद में......



                   "एकलव्य"
"एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह 
   


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Tuesday, 14 March 2017

"तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'चार'


                                              "तैरतीं ख़्वाहिशें" भाग 'चार' 
"तैरतीं ख़्वाहिशें"



कई रातें काटीं हैं,मैखानों में पीते-पीते 
मुक़्क़म्मल ज़िंदगी काट ली,ज़िंदगी जीते-जीते,

आधा सा भरा वो ग्लास,पूरा लगता था 
अज़नबी सा कोई तरन्नुम,अपना सा लगता था,

रात की वो काली स्याही,लगती थी डरावनी उनके बिना 
हवाओं के झोंकों से,दरवाज़े का खुलना-बंद होना 
दिल में ख़लबली सी मचाती थी,उनके बिना,

लाख कोशिशें  करता था,गीली माचिस से चिराग़े रौशन करना 
टकरा कर टूट जाया करतीं थीं तीलियाँ,दीवारों पे घिसते-घिसते,

दिल तो धड़कता है रोज़,अपनी मर्ज़ी से 
ज़िस्म का क्या करूँ,साथ नहीं देता इनका,अपनी ख़ुदग़र्जी से,

हर शाम ज़िंदगी मेरी,मौत को आवाज़ लगाती है बड़ी ही सादग़ी से 
मैं तो दूसरों के जलसे में शामिल हूँ,यह कहकर 
मौत भी मुँह मोड़ लेती है,बड़े अदायगी से,

और कहती है 
फ़िक्र न कर आऊँगी मैं ज़रूर,उस ज़िंदगी से मिलने 
जो तेरी होकर भी,तेरी न बन सकी,

हूँ तो मौत ही सही,रह जाऊँगी तेरे पास 
तेरी ज़िंदगी बनके,

साथ दूँगी तेरा क़यामत तक,जब तक दुनियां बाक़ी है
दूँगी हाथ तब तक तुझे,तेरी परछाईयाँ बाक़ी हैं .........  


                      "एकलव्य"
 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह

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Saturday, 11 March 2017

"डर लगता है आज भी"

                                                     "डर लगता है आज भी" 
 "डर लगता है आज भी" 



डर लगता है फिर वही,आँखें मूंदने से 
                                  सपनें देखने से  
                                  उनके टूटने से 
                                  अश्क गिरने से
                                 अरमान बहने से
                                  दरिया बनने से

             दूर कहीं एक पंक्षी का घोंसला    
                              टूटकर बिखरने से
                              सपने चूर-चूर होने से   
                              मन के अधीर होने से 
                              मौसम ग़मगीन होने से 
                              बादलों के गरजने से 
                              बिजलियों के चमकने से
                              रास्तों के उजड़ने से 
                              पैरों के थकने से  
                              थक कर रुकने से
                              रुक कर सोचने से 
                              सोचकर रोने से 
                              रोकर खोने से 
                              खोकर पाने से
                              पाकर सोने से
                              सपनें संजोने से   
                              फिर से बेफ़िक्र होने से
                              मंज़िल ओझल होने से 

                      फिर मन के बेचैन होने से 
                             होकर रास्ते ढूंढने से 
                             मिलकर साथ चलने से
                             साथ छूटने से,
                             डर लगता है आज भी।........डर लगता है आज भी।........  


                       "एकलव्य"
 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह


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"स्वतंत्रता के सही मायनें" 'लेख'

 "स्वतंत्रता के सही मायनें"

                                     

                              "स्वतंत्रता के सही मायनें"  'लेख' 

तर्क!क्या हम स्वतंत्र हैं ?हमने स्वतंत्रता के सही परिदृश्य को समझा अथवा प्रसार किया या हम मिथ्या ही अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर रहें हैं ?
क्या स्वयं की स्वतंत्रता ही राष्ट्र की स्वतंत्रता है, या हम प्रसन्न हैं अपनी स्वयं की ख़ुशहाली पर !
कोई धनवान है !स्वतंत्र है ,कोई अच्छे पद पर कार्यरत है !स्वतंत्र है ,कोई देश की राजनीति में सहभागी है !स्वतंत्र है ,हम अच्छा जीवन व्यतीत कर रहें हैं !मतलब हम स्वतंत्र हैं। 
इस तरह के अनेकों विचार मेरे अंतरात्मा को झकझोड़ देतीं थीं ,जब मैं सत्यता से परिचित होता था। 
आज भी यही परिस्थितियां मन-मस्तिष्क में बारम्बार आतीं रहतीं हैं। 
यही वह मूल कारण है,मेरी लेखनी के क्षेत्र में प्रवेश करने का,क्योंकि मैं राजनेता नहीं जो जनता को भाषणों से आह्लादित करूँ ,मेरे पास एक अनमोल विधा है !लेखनी,जो प्रेरित है इन्हीं अनेकों क्रंदन करते विचारों से। 

बात उस समय की है ,जब मैं अपने अध्ययन के दौरान व्यस्त हुआ करता था ,सूक्ष्मजीवविज्ञान प्रयोगशाला मुझे संसार प्रतीत हुआ करती थी ,मुझे लगता यही जीवन है। मैं स्वतंत्र हूँ ! एक छोटे से प्रयोगशाला के दायरे में। 
जब कभी विश्वविद्यालय में पर्व के अवसरों के उपलक्ष में अवकाश हुआ करता ,मैं अपने जन्म स्थान (काशी) जाने के लिए तैयार होता। 
रेलगाड़ी (लौहपथ गामिनी ) के माध्यम से यात्रा किया करता ,परन्तु ज्यों ही मैं प्लेटफार्म (लौहपथ गामिनी विश्राम स्थल) की ओर प्रस्थान करता कुछ बच्चे अपनी दयनीय दशा (मैले-कुचैले ,फटे कपड़े पहनकर ) में मेरे पीछे दौड़ लगाते चंद पैसों व रोटी के लिये। जेब टटोलते हुए कुछ पैसे उनके हाथ पर रखता ,मन ही मन अपनेआप को  धिक्कारता हुआ गाड़ी में स्थान ग्रहण करता ,रास्ते भर यही सोचता ,मैं इंसान हूँ या पशु या इंसान होने का दिखावा कर रहा हूँ ,ये विचार मेरे मन में तब उतराते जब पास बैठा व्यक्ति यह
कहता नजर आता कुछ यूँ 
"आजकल लोग बेरोज़गारी बढ़ा रहें हैं, इन बच्चों को पैसे देकर इन्हें बढ़ावा दे रहें हैं।" मैं भी मन में अपने आप को कोसने लगता ,गाड़ी मध्यमार्ग में रुकती ,एक बालक (लगभग आठ-दस वर्ष का ) कुचली हुई बोतलों में पानी भरकर बेच रहा था,मैंने वो पानी खरीद लिया (पांच रूपए में ) ,मेरे बगल वाले स्थान पर बैठा व्यक्ति बोला,
"आजकल लोग गलत व्यवसाय को बढ़ावा दे रहें हैं",पुनः मैं विचार करने लगा कि क्या मैंने सही किया ? (पर आज संभवतः उन कथा बाचने वाले व्यक्तियों पर स्वयं लज्जा आने लगी है।) कुछ समय बीत जाने के बाद उन्हीं महानुभावों में से कुछ ज्ञानी श्रीमान ,राजनीति ,देश व स्वतंत्रता  का ब्यौरा देना शुरु कर देते ,एक-दूसरे को वाकयुद्ध में पटखनी देते नजर आते। मैं सहमा-सहमा सा उनके अनमोल विचार सुनता ,देखते-देखते एक बृद्धा जो लगभग असहाय थी (चूँकि द्वितीय श्रेणी में स्थान आरक्षित नहीं होता,जो लड़-लड़ाके पहले पहुँचा स्थान उसका ,स्वतंत्रता का अधिकार !),महिला ने प्रार्थना की कृपया थोड़ी जगह दें ,महानुभावों ने कहा- यहाँ स्थान खाली नहीं है आगे जाइये,जबकि श्रीमान दोनों पैर फैला कर बैठे थे! परंतु स्थान नहीं दे सकते (सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार ) ,मैंने उस महिला को अपना स्थान तो नहीं किन्तु अपने निकट थोड़ा स्थान अवश्य दे दिया ताकि वह  बैठ सके,रोते-धोते मैं अपने गंतव्य को पहुँचा,किन्तु यह यात्रा मेरे मन-मस्तिष्क को सदैव प्रयत्नशील बनाती रही,यह विचार करने के लिए कि क्या हम स्वतंत्रता का सही मायने में अर्थ समझ पायें हैं या नाटकीय ढंग से इसे परोसने का केवल दिखावामात्र  करते हैं, मेरे विचार से ! 

"तब तक हम स्वतंत्र नहीं हैं,जब तक हम अपने स्वयं के स्वार्थ भरे विचारों से पूर्णतया स्वतंत्र नहीं हो 
जाते"




                      "एकलव्य"

 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह


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Friday, 10 March 2017

"तूँ है एक अनुपम तस्वीर" 'नारी'


                                                    "तूँ है एक अनुपम तस्वीर" 'नारी' 
 चिरस्थाई जीवन वट "नारी" 



चिरस्थाई जीवन वट है 
शाखायें तेरी प्रबल धीर 
मानव मात्र की एक प्रेरणा 
बनकर खड़ी धरा अधीर,

संवेदनाओं में तेरी ममता 
छवि लक्षित तेरी गंभीर 
दया बनकर रग-रग में बसा है 
करती जीवन शुद्ध समीर,

धरा हुई है ,दुषित तुम बिन 
करे तूं निर्मल,मन के पीर 
चोट पे जैसे मरहम बनकर 
कष्ट हरे है ,पोंछे नीर,

नेत्र से तेरे अश्रु गिरतें 
वो भी लगतें,अमूल्य सीप 
जो पायें हैं,इनकों जग में 
बना है वो तो कौशल वीर,

मानव बना है आज स्वार्थी 
काटें हैं अपना ही मूल 
हरी-भरी धरती को बंज़र 
करता है जीवन प्रतिकूल,

तेरे त्याग को विस्मृत करके 
बने स्वयं उत्पत्ति का कर्ता 
समझ न इसको सत्य ज्ञान का 
प्रकृति की एक अदभुत रचना  

तूँ है एक अनुपम तस्वीर। .......तूँ है एक अनुपम तस्वीर।.......


                         "एकलव्य"
 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह