Wednesday, 16 August 2017

''वही पेड़ बिना पत्तों के''

''वही पेड़ बिना पत्तों के''

वही पेड़
बिना पत्तों के 
झुरमुट से
झाँकता 
मन को मेरे 
भाँपता

कल नहीं सोया था 
एक निद्रा 
शीतल भरी 
उनके स्मरणों को 
संजोता हुआ

शुष्क हो चलें हैं 
जीवन के विचार 
पत्ते तो लगे हैं 
सूखी डालियों पे 
झड़ रहें हैं 
रह-रह कर 
अश्रु सा !
धरा की कोंख में

वर्षा तो आयेगी 
कर प्रतीक्षित बैठा है
स्वयं को छुपाए 
वो सोचता है

कुछ अपूर्ण विचार 
टटोलता हूँ 
कुछ स्मृतियाँ 
तोलता हूँ 
बरबस ही 
क्षणिक इच्छाओं के 
पतवार खेता हूँ

हृदयपटल पे जमी काई 
हरी हो जाती है 
प्रेम की 
कुछ बूंदें 
छलक जातीं हैं 
एक आस बनकर 
करतीं हैं 
पुनर्जीवित ! मुझको  
बुनने की प्रेरणा देती हुई 
जीवन के कई 
मकड़जाल  पुनः 

संदेह तो होता है 
प्रकृति की 
सहानुभूति पर 

एक बूँद का प्यासा 
मरुस्थल में भी 
मृगमरीचिका  को 
जलाशय कहता है

सदियों बीत गए 
स्मरण नहीं  
कब आईं थीं ?
ख़ुशियाँ !
मेरी चौखट पे 
खटखटाने  हृदयपट को 
वर्तमान झाँक रहा है 
मेरे अंतर्मन में
कुछ आशाओं की 
पोटली बाँधे 

बुलाता  है मुझे 
कहता है मेरे 
जंग लगे 
श्रवण में 
कुछ खुसफुसाहट भरे 
स्वर में 

मैं आया हूँ 
ओ ! मतवाले 
जाग जा !
स्वप्न की दुनिया से 
वास्तविक हूँ  मैं 
दिवास्वप्न नहीं

ले जाऊँगा ! तुझे 
दुनिया के उस पार
जहाँ न कोई 
दुःख होगा 
न ही सुख की 
मिथ्या स्मृतियाँ !

होंगी तो केवल 
तेरा वही अस्तित्व 
प्रकृति में समाता हुआ 
जीवन का रास्ता 
तुझे दिखाता हुआ

झूठी हँसी न होगी 
मुखमंडल पे तेरे 
अवसाद न होंगे 
हताशाओं के 
हृदयपटल पे !

जीवन का यही 
सारभौमिक सत्य 
तुझे दिखाऊँगा !
अपना तो नहीं
पराया भी नहीं
तुझे बनाऊँगा !


"एकलव्य"    




Monday, 7 August 2017

''बेग़ैरत''

उस मील के पत्थर को 
सोचता चला जाता हूँ 
इस उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 

बस लिखता चला जाता हूँ ..... 

बस्ती हुई थी रौशन 
जब गुज़रे थे, इन गलियों से होकर 
कितना बेग़ैरत था, मैं 
अपनी ही खुदगर्ज़ी में   
सोचकर आज़ 
आँसू  बहाता हूँ 

बस लिखता चला जाता हूँ......  

सरेआम किया नंगा 
ख़्याल नहीं था 
इंसानियत का हमें 
ख़ुद पे बन आई आज़ 
धर्म इंसानियत 
बताता हूँ 

बस लिखता चला जाता हूँ.......  

क़त्ल मैंने भी किए कई 
बड़ा बेरहम होकर 
चौराहों पे 
क़त्ल हुआ हूँ आज़ 
बेरहम बताता हूँ 

बस लिखता चला जाता हूँ........ 

नाचता था 
ईद -दिवाली समझकर 
दूसरों की मैय्यत में 
मेरी मैय्यत में 
मत नाचो ! ख़ुदग़र्ज़ों 
मौक़ा परस्त 
बताता हूँ 

बस लिखता चला जाता हूँ .......  

दर्द हुआ दुनियावालों 
ख़ता है मेरी 
दर्द हुआ है मुझको 
नासूर दिखाता हूँ 

इस उम्र की दहलीज़ पर 
आकर फ़िसल जाता हूँ 

बस लिखता चला जाता हूँ ........ 

''एकलव्य'' 


Friday, 7 July 2017

"कहीं मेरे कफ़न की चमक"

कुछ जलाये गए ,कुछ बुझाये गए
कुछ काटे गए ,कुछ दफ़नाये गए
मुझको मुक़्क़म्मल जमीं न मिली
मेरे अधूरे से नाम मिटाए गए 


एक वक़्त था ! मेरा नाम शुमार हुआ करता था 

चंद घड़ी के लिये ही सही ,  ख़ास -ओ -आम हुआ करता था 
रातों -दिन महफ़ील जमती थी ,मेरे महलों की चौखट पर
चारों पहर जलसे होते थे ,मेरी नुमाइंदगी में
करते थे लोग सज़दे मेरी सादग़ी में 


एक वक़्त आज है ! अकेला क़ब्रिस्तान में पड़ा -पड़ा

ना जाने किसका इंतज़ार करता रहता हूँ


कुछ परिंदे बैठें हैं मेरी क़ब्र की दिवार पर

पत्थर पे लिखी स्याही ,कुछ मिट सी गई है
मेरे सीने पर रखे वो सफ़ेद से संगमरमर
घिस से गयें हैं 


हवाओं के चलनें से उड़े सूखे पत्ते ,जिन्हें ढ़कने को आतुर हैं

धूल भरीं आंधियां ,जैसे हुक़्म-परस्त हो गयीं हों
मेरे  सीनें पर जमती जा रहीं हैं 


फ़िर भी आज़, एक फ़िक्र सताती है मुझे

कहीं मेरे कपड़े मैले ना हों जायें
कहीं मेरी रुह ,दाग़दार ना हो जाए
कहीं मेरे कफ़न की चमक फीक़ी ना पड़ जाए



   "एकलव्य"  



               

Wednesday, 28 June 2017

"ख़ाली माटी की जमीं"

बदलते समाज में रिश्तों का मूल्य गिरता चला जा रहा है। बूढ़े माता-पिता बच्चों को बोझ  प्रतीत होने लगे हैं और हो भी क्यूँ न ? उनके किसी काम के जो नहीं रह गए ! हास् होती सम्बन्धों में संवेदनायें ,धन्यवाद। 
                                                                                                                                                  ''एकलव्य'' 

                                                                                                           
 बचपन था मेरा नासमझ
ले आया बद की रौशनी
एक ओर करता ग़म अंधेरा
उस ओर ख़ुश है रौशनी 

पाने को एक छोटी ख़ुशी
एक दौड़ लगती है कहीं
कुचले गये अरमान सारे
इस होड़ के रौ में वहीं 

चित्कारता मन भी कहे

 कब ख़तम ? ये खेल भी

जारी रहा बरसों तलक
बस करो ! अब अंत भी


जीता रहा गिन के नये

हर वर्ष को यह सोचकर
बाक़ी अभी है और भी
कल का सवेरा-दोपहर 


फ़िर से  हूँ कसता, मैं कमर

कुछ कर दिखाऊँ ! मैं नई
उठकर खड़ा हूँ, लांगने
मिल जाए कोई दुनियां नई 


तन पर पड़ीं हैं झुर्रियाँ

आँखें हैं पथराई हुईं
सामर्थ्य न मेरे पास है
क़दमों में लड़खड़ाहट भरी 


आगे अँधेरा घनघोर है

पास में दीपक नहीं
एक रौशनी की दरकार आज़
असहाय जीवन में कहीं 


ऑंखें खुलीं , बैठा हुआ

उस नीम की छाया तले
झूला था मैं बचपन तले
जिसकी टहनियों से लगे 


पत्ते नहीं अब शेष हैं

कुछ लकड़ियाँ अवशेष हैं !
अब तमन्ना, किसकी करूँ
बच गयें अब लेश हैं 

हूँ डोलता तन को झुकाये

सहारा हैं मेरी डंडियाँ
रोता हूँ बस यह सोचकर
कभी था तनकर मैं खड़ा 

धुत्कारते ! मुझको वही

पाला था जिनको प्यार से
हैं रुलाते मुझको वही
जिनकों समेटा बाँह में 


तिल -तिल बनाया मैंने वही

जो आशियां था प्यार का
जिसमें लगाये सपनें कई
वो शामियां बहार का 


आज़ जिनके छत वही

मेरे सर पे हैं नहीं
मौसमों के मार झेलूँ
रात वो भूली नहीं !


तन पर पड़ा कम्बल वही

जिसमें नये से छेद हैं
इनकों प्यार झोंकों से इतना
रोके इनकों हैं नहीं 


बूढ़े हाँथों से बनाया

मैंने एक छप्पर नई
बूढ़े मन को एक दिलाशा
सर पे है एक छत नई 


रात भर हूँ काँपता

कुछ सोचकर यूँ जागता
झूठे ही सपनें देखता
पल भर यूँ , दिल को सेंकता 


कल फिर होगा ,एक सवेरा नया

अपना भी होगा ,एक बसेरा नया 


रौशनी चमकती आयेगी

ज़िंदगी थोड़ी शर्मायेगी
होकर खड़ा ,तनकर यहाँ
दुनियां करूँगा ! मैं जवां 


आ गई है रौशनी ! अब मैं कहाँ ?

लगता है जैसे खो गया
आँखें खुलीं, पथरा गईं
हरक़त न कोई ,अब यहाँ 


कुछ लोग आयें हैं मेरे

महलों वाले इस छप्पर में
लिपटा रहा मैं रात भर
अरमानों के कम्बल में
फ़िरता रहा, मैं रात भर
वीरानों से जंगल में 


बाँधते हैं वो मुझे, दुधिया भरे पोशाक़ में

लादकर मुझको चले ,बस मिलाने राख़ में !


आज़ ख़ुश हूँ सोचकर

एक मिली दुनियां नई
आज़ हूँ ,कुछ ऐंठ कर
फ़िर शुरू एक नया सफ़र 


कितने नासमझ ये लोग हैं

रोते दिखावे के लिए
झूठे बनाते पुल नये 
रेत के हरदम कई 


पल में ये बह जायेंगे

समंदर के थपेड़ों से अभी
हाँथ कुछ ना पायेंगे
ख़ाली माटी की जमीं। .... .........ख़ाली माटी की जमीं। .... ..



"एकलव्य" 



Friday, 23 June 2017

"मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा"

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा
हवाओं को लपेट  के  तू ,  आंधियाँ बना -बना
लहू की  गर्मियों से तूं , मशाल तो जला -जला
जला दे ग़म के शामियां ,नई सुबह तो ला ज़रा
                                                               
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

भूल जा तूँ जिंदगी ,मौत को गले लगा
झूठ की जो लालसा ,मन से तू निकाल दे
सपनों के पुलिंदों को ,कदमों से ठोकर मार दे
क़िस्मत मिलेगी धूल में ,माथे से लगा ज़रा
                                                                                                
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

सोच मत तू है धरा ,पंख तो फैला ज़रा
उड़ जा आसमान में ,विश्वास से भरा -भरा
देख  मत  यूं  मुड़ के  तूं ,  लौटने के वास्ते
क़िस्मत को कर ले तू बुलंद ,कठिन हैं ये रास्ते
बना ले ख़ुद को क़ाबिले ,लोगों के मिसाल की
अमिट लक़ीर खींच दे ,ब्रहमांड में खरा -खरा
                                             
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

व्यक्तित्व बन पहचान की ,अपने को ज़रा -ज़रा
दुनियां गले लगाएगी ,कोटि -कोटि ,धरा - धरा
चक्षुएं   बिछाएगी ,यहाँ -वहां ,  जहाँ  -तहाँ
ईश्वर भी मुस्कुराएगा , देखकर तेरी अदा
वो भी सिर झुकायेगा ,देर ही सही ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

                               "एकलव्य "     


                                           

Thursday, 22 June 2017

''पथ के रज''

गा रहीं हैं,सूनी सड़कें 
ओ ! पथिक 
तूँ लौट आ 
भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता 
नींद से ख़ुद को जगा 

प्रतिक्षण प्रशंसा स्वयं लूटे 
मिथ्या ही राजा बना 
चरणों की , तूँ धूल है  
सत्य विस्मृत कर चला 

क्षणभर की है ये रौशनी 
रात्रि में है दिन दिखे 
माया मिली ये रात्रि है 
जिसमें आकर,जा फँसा 

ललाट पे होकर खींची
जीवन की कटु सच्चाईयाँ 
पोंछना तूँ व्यर्थ चाहे 
भाग्य की अंगड़ाईयाँ 

सड़क से होती शुरू 
अंत होंगी सड़क पे 
जन्म से पीछा छुड़ाता 
मृत्यु ही परछाईयाँ 

रुक पथिक ! मत जा उधर 
नहीं कोई, तेरा यहाँ 
साक्षात्कार सत्य से करातीं 
तेरी ये परेशानियाँ 

महल हैं, दिखावे की ख़ातिर 
पराये वो, तेरे नहीं 
भूलने का प्रयत्न करता 
अपनी अनुपम झोपड़ी 

बच्चे भूखे तेरे भले हैं 
स्नेह से बुलाते अभी 
चूल्हे पर भोजन बनाती 
प्यारी तेरी, अर्धांगिनी
खोज क्यूँ ? जीवन की करता 
अंत है तेरा यही,    

 गा रहीं हैं,सूनी सड़कें 
ओ ! पथिक 
तूँ लौट आ 
भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता 
नींद से ख़ुद को जगा ....... 


"एकलव्य" 








  

Friday, 16 June 2017

"न्याय की वेदी"

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !
लज्ज़ा तनिक 
न तुझको 
हाथ रखे है !
सिर पर 

मैं रंज सदैव ही 
करता 
मानुष स्वयं हूँ 
कहकर  
लाशों के ढेर पे 
बैठा 
बन ! निर्लज्ज़ 
तूँ मरघट 

स्वर चीखतीं ! हरदम 
मेरे श्रवण से होकर 
हिम सा ! द्रवित 
हृदय होता है
 शोक की 
ऊष्मा पाकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !

सुनकर ! अनसुनी 
करता 
क्यूँ ? आवेश में 
आकर 

सुन ले ! नश्वर 
ओ ! मानव 
अंत भी तेरा 
निश्चित 
काल समीप है 
तेरे 
बन ! छाया सा 
दानव 

जो आज हैं 
चीथड़ों में लिपटे 
कल वे भी 
मारे जाएंगे !
तूँ राजवस्त्र ! पहनता 
वे तुझको भी 
दफ़नायेंगे !

तूँ क्यूँ ? माटी से 
बचता 
कलंक है माटी 
कहकर 
कलंकित होगा 
पवित्र ! शरीर 
इसी कलंक में 
मिलकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !

पाषाण बिछेंगे ! तुमपर 
सिर से छाती पर 
होकर 
पशु रौंदेंगे ! तुझको 
पथ सामान्य 
समझकर 
घास उगेंगे ! तुझपर 
मेरा डेरा है 
कहकर 
संसार करेगा ! विस्मृत 
कटु इतिहास 
समझकर 
पीड़ित तुझको ही 
कोसेंगे !
घूँटें जल की 
पी-पीकर 

मैं भी गुजरूंगा ! तेरी 
सूनी गलियों से 
होकर 
मुस्कान के व्यंग 
चलाऊँगा ! तेरे 
कर्मों पर 
हँसकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !



"एकलव्य" 

Saturday, 10 June 2017

"कालनिर्माता"

स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी ये इकाई ही हमारे विक्राल शरीर का मूलभूत आधार है जिस प्रकार हमारे राष्ट्र का मूलभूत आधार 'किसान' ! परन्तु  आज उसी अन्नदाता की अनदेखी देश कर रहा है जो न्यायोचित नही,भविष्य में इसके विध्वंसक परिणाम होना तय है यदि हम नहीं चेते ! उस ईश्वररूपी संसार पालक को उसका हक़ नहीं दिया ! देश अपनी बर्बादी का स्वयं जिम्मेदार होगा। धन्यवाद 

"एकलव्य" 


 रे ! मानव

तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा
ब्रह्माण्ड जो तेरा
रचते हैं
पृथ्वी की काया
गढ़ते हैं !
सम्मान, तूँ उनका
तौल रहा

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा

मृदा स्वर्ण ! बनायें
कण से
फल जो हल का
लगायें ! तल में
पाषाण खोद ! उठायें
कर से
क्यूँ ? उनका हक़
छीन रहा
जीवन है, उनका
दीन बना

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा

पाता चैन तूँ
चार-चौबारी
वे घूमें हैं !
क्यांरी-क्यांरी 
खड्ग पहन तूं
चला ! शौक़ से
मूँछ ऐंठता ! बड़े
रौब से
वस्त्र नहीं, उनके
तन लगते
नग्न पाँव ना
चप्पल सजते

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  

सांय-प्रातः तूँ 
दीप जलाये 
छप्पन भोग 
पत्थर को लगाए 
विश्व पुरोहित स्वयं 
कहाए !
नहीं अन्नोत्पत्ति 
क्यूँ ? दायित्व तुम्हारा 
मिथ्या ज्ञान तूँ , व्यर्थ 
बघारे  !
बता नीच उन्हें 
बारी-बारी 

स्वयं उच्च 
बना ! बैठा है 
मृदा धूषित 
उनकी लाचारी  

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  

जाग ! तनिक 
तूँ, जग निर्माता 
लगा गले ! जो 
अन्न का दाता 
दे ! सम्मान, जो 
हक़ उनका है  
बना उनको ही 
भाग्य विधाता !

नहीं काम,आयेंगे तेरे 
वेद ! पुराण,क़ुरान व गीता 
जब क्षुधा,उदर में 
नाचेगी !
बन जाएगा ! क्षण में 
माटी, आह ! जो 
उनकी जागेगी !

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  



"एकलव्य" 
  

Monday, 29 May 2017

"प्राणदायिनी"

वो दूध पिलाती 
माता !
वो गले लगाती 
माता !
कोमल चक्षु में 
अश्रु लेकर 
तुझे बुलाती 
माता !

वो जग दिखलाती 
माता !
तुझको बहलाती 
माता !
तेरे सिर को 
हृदय लगाये 
ब्रह्माण्ड समेटे 
गाथा !

रोती सड़क पे 
माता !
जिसको छोड़ा 
तूने कहकर 
अब तेरा 
भाग्य ! विधाता 

स्मरण नहीं क्या ? तुझको 
आता !
ईश्वर का स्पर्श थी 
माता !
हुआ आज मन 
कलुषित ! तेरा 
कहता, तुझमें 
दरिद्र समाता !

लालचवश है 
बोझ ! बताता 
गृह तेरा संकीर्ण 
हुआ रे !
बूढ़ी माँ को 
व्यर्थ रूलाता !

देख ! तनिक तूं
नयन में उसके 
तीनों लोक है 
माता !
क्यूँ ? करता,फेरे 
मंदिर-मस्ज़िद के 
अनुपम ! ख़ुदा 
बुलाता 

रे ! पापी 
निर्लज्ज तूँ मानव
तुझको कुछ नहीं 
आता !
ईश्वर की,स्वर्ग सी 
भेंट है वो !
जिसको तूँ 
बिसराता 

मुक्ति मार्ग ! की 
इच्छा करता 
मन, वन-वन 
भटकाता 
देख ! वही है 
ज्ञान पुंज,
जिसको देख 
न पाता 

बिन उसके 
दुनियां में कौन ? रोटी 
तुझे खिलाता 
प्राणदायिनी ! जननी वो 
तूँ जिसको, ठुकराता 

हे ! मानव 
तूँ देख ! तनिक 
जीवन, प्राण-पिपासा 
तेरी प्यारी 
माता !   

वो दूध पिलाती 
माता !
वो गले लगाती 
माता !


                          "एकलव्य"                                                    

    

Monday, 22 May 2017

''विजय पताका''

वे शहद 
चटातें हैं !
तुमको 
मैं नमक 
लगाता हूँ !
तुमको 

वे स्वप्न 
दिखाते हैं !
तुमको 
मैं झलक 
दिखाता हूँ !
तुमको 

वे रंग लगातें हैं !
तुमको 
मैं रक्त 
दिखाता हूँ !
तुमको 

गर्दन पर चाकू 
मलते हैं ! वे 
मैं बलि 
चढ़ाता हूँ !
तुमको 

झांसे में रखते ! वे 
प्रतिक्षण 
मैं सत्य 
दिखाता हूँ !
तुमको 

आह्लादित करते ! वे
पल-पल 
निर्लज्ज बनाता हूँ !
तुमको 

विस्मृत कराते !
शक्ति तेरी 
मैं स्मरण  कराता हूँ !
तुमको 

वे मौन बताते !
सभ्य ज्ञान 
उदण्ड बनाता हूँ !
तुमको 

तुझमें रचते ! वे 
नीति कूट 
मैं रण में लाता हूँ !
तुमको 

शस्त्र त्याग ! तूँ 
हे ! अर्जुन 
उपदेश बताते ! वे 
तुमको 
करता हूँ ! मैं 
शंखनाद 
महाभारत रण लाता 
तुमको 

उठ जा ! हे 
तूँ,मानव पुत्र 
रथ में बैठा ! मैं 
तेरे साथ 

तूँ देख ! अनोखा 
लक्ष्य अडिग 
भेद उसे तूँ ! कर 
प्रहार 

उत्पन्न करेंगे ! विघ्न बड़े 
शत्रु सदैव ही 
शत-शत बार 

नाश करेगा ! स्वयं 
शौर्य से 
कूट रचित 
शत्रु जंजाल 

फहरायेगा ! 'विजय पताका' 
राष्ट्र नहीं 
ब्रह्माण्ड ! विशाल 

अविस्मरणीय होगी 
कीर्ति तेरी 
पाँव पड़ेंगे 
धरा ! महान 


"एकलव्य" 

Saturday, 20 May 2017

"मुक्ति मार्ग"

इस लोक में
जन्मा !
अज्ञानी
कूट छिपा
मैं
अभिमानी !
सुन्दर तल हैं
'कर' के मेरे
जिनसे करता हूँ
नादानी !
समय शेष है
अहम् का
मेरे
भ्रमित विचरता !
माया वन
में
भ्रम रूपी मुझे
हिरण दिखे है
स्वप्न दिवा की
बात कहे है
काक मुझे
कोयल
प्रतीत हो !
कर्कश वाणी
अमृत ! वर्षा के
मान स्वर
दिन-रात
पिये हो
सत्य प्रतीत हो
दुर्जन मेरा
काल ! बुलाऊँ
बना ! सवेरा
मोहिनी के
मंदिरा ! का
प्यासा
गढ़ूँ ! मिथ्या
सुन्दर
अभिलाषा !
ज्ञानी को मैं
मूर्ख
बताऊँ !
बता स्वयं
ज्ञानी
कहलाऊँ
मधुशाला ! अब
बना है
मंदिर
करूँ मैं
अपना
आत्म समर्पित !
आत्मोत्सर्ग की 
पराकाष्ठा 
ख़ूब ! बनाऊँ 
उन्मुख होकर 
घर बैठी 
अर्धांगिनी रोये !
बुझा-बुझा के 
मुझको सोये 
रात्रि भए हो 
किवाड़ बुलाऊँ !
अर्द्ध निद्रा उसे 
जगाऊँ 
जिह्वा खोले !
छला बताऊँ 
स्वयं को मैं 
रणवीर बनाऊँ 
सांय-प्रातः ! मैं 
रोज कमाऊँ 
मधुशाला ! में 
ख़ूब लुटाऊँ
पी-पीकर 
मरणासन्न ! 
जाऊँ 
यही मुक्ति ! मैं 
मार्ग 
बताऊँ 


"एकलव्य"