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शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

बाट ( बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियाँ )


   बाट 
( बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियाँ )
"एक 'दर्पण' के टूटे हुए अनेक टुकड़े, जिनको मैं जितने भी शब्द दूँ, संभवतः पर्याप्त नहीं!"     


सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलाई। 
वो निर्लज्ज, परदेश बलमुआ
रात-खाट कुम्हलायी।  

चकिया भर-भर दाना पीसूँ 
डाले पिया खटाई। 
साँझ-सवेरे रोऊँ भर-भर,
अखियाँ नींद न आयी।  

सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलायी।  

ना चिट्ठी, कोई पाती आयी 
शोक पिया संदेशा लायी । 
घोरि-घोरि अब बीतन रतिया 
मोहे समझ न आयी । 

अंत समय निज आवन लागी 
टूटी खाट बिछायी । 
बंद हो रही अँखियन मोरी 
कैसी लगन लगायी । 

सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलायी ।



चितवन कैसी, रात चितेरे
मन जोगी संग लागा।
भींगा-भींगा हृदय भी प्यासा
दिन अति लागे माया।

  मुरगी पकड़ूँ कर से अपने
दौड़-दौड़कर द्वारे,
मेदिनी फिर-फिर झाड़ लगाऊँ
आ बैठूँ चौबारे।

साँझ भये घर दीपक धारूँ
निज फूँकू मुँह चूल्हा
खाँसत-खाँसत हारूँ मन से
चूल्हा बना है दूल्हा।

इस दूल्हे से प्रीत भई है
मेरी जतन बड़ाई,
स्नेह करूँ अति मन से कैसे
अंचिया धरूँ कढ़ाई।

कुलटा कैसी किसमत पायी
उनकी बनी लुगाई
दिन-प्रतिदिन हैं ऐसे बीते
जीवन बना खटाई ।

आज चढ़ रही, बसियन की सीढ़ियाँ
घर कैसे बिसराई
कोई नहीं है रोने वाला
प्रियतम करे विदाई।

↔ 
  
मुनुआ-चुनुआ 
तात-पति सब 
बैठे हैं चौबारे,
मैं कलमुई चूल्हा फूँकू 
उर-बिच बहत पनारे। 

श्वान, गऊ घर बरधा नाचे 
चीख़-चीख़  बौराये,
नाद-नाद मैं भूँसा बोरूँ 
सास भोर चिल्लाये। 

दाना डालूँ, पानी लाऊँ 
बकरी घास खिलाऊँ,
गुड़गुड़-गुड़गुड़ हुक़्क़ा बोले 
सुन-सुन आध लजाऊँ। 

बारि-बारि मैं तोपन लागूँ 
घूँघट के चौपाई,
मर्द जने, मुए ताकन लागे 
घूँघट तन पर जाई। 

देख-देख मोहे साजन जलते,
कहते ओ हरजाई !
काहे ओ, निर्लज्ज खड़ी थी
बिन तोपन परछाईं। 

भावावेश में, मैं भी कह दूँ 
तोहे लाज न आयी  
खुद सोये हो चादर ताने 
मेहर पीर पराई। 

जस मुँह खोलूँ, पीटन जाऊँ 
वही मुंगर से सवतिया 
मैं निर्लज्ज बल, गिरूँ ओसारे 
रोऊँ भर-भर रतियाँ। 

कोसूँ मुँहभर तात तनिक को 
काहे जिद भिजवाया 
बाँध खूँट के, ऐसा जनावर 
अपना पगहा छुड़ाया। 

↔       



मड़ई हमरे लूह चलत हैं 
बुढ़वा खाँसत हारी, 
देखन पीड़ा, दरद सजनवा 
चिन्ता हमहु मारी। 

खेल गदेलन, खेल-खेलके
क्षुधा-छोर नियराए, 
माई-माई, लिपट-लिपटकर 
गुड़ से रोटिया खाये। 

कलही का, मैं दूँगी इनको 
झोपड़ डिब्बा खाली, 
एक तरफ हैं साजन पसरे 
कछु कहते हैं नाही।

वैद बुलाऊँ कैसे घर में 
जेवर साहू खाया,
अब तो माटी धूरी उड़त है 
सूखा खेत गँवाया। 

लाज-शरम बस बाक़ी हमरी 
बस धन यही बचाया, 
ठकुरा हमको देख-देखकर 
गली-गली पगलाया। 

आधी राति को बुढ़वा दौड़ा 
कहता, समय है आया,
भोर भई, मैं खींचूँ शव को 
मरघट पास न आया। 

जंगल-जंगल तोरूँ लकड़ी 
मुरदा पिया जलाऊँ,
रोक-रोककर, बालक मन को 
उल्लू ख़ूब बनाऊँ। 

रात भई, अब अँधियारे में 
दीया नहीं जलाऊँ,
खाऊँ किरिया, सौ-सौ उनकी 
कुएँ ख़ूब नहाऊँ। 

ढाँढस बाँधू बचवन के मैं 
हरदी-नमक ऊबालुँ,
उबला-उबला भात,नमक-संग 
उनको ख़ूब खिलाऊँ। 

भोर भई, खेतन में जोतूँ 
खुद को बैल बनाए, 
बैलन घूरे, हमको देखें 
रगड़-रगड़ बौराए। 

सूर्य देवता दया न खाएं 
अगनी-सा बरसायें, 
बिन पानी मैं गिरी खेताड़ी 
मुँह में धूरि लगाये। 

↔    
                   
 कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 
संग परदेसी नाता जोरा 
भोर-बिसव अब मैना गाये 
कूकट जाग गये अब थोरा। 


कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

शुरु हो रहा, दिन हो जैसे 
डाले चकिया दाना वैसे 
लरिका खेल रहे हैं चारों 
कहते-कहते लाल हैं तोरा। 

 कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

बुढ़िया कहती, राशन ला रे!
घर में हैं परधान पधारे,
बाँध जनेऊ तोंद पे अपने 
कहते हैं भगवान दुआरे। 

लोटा ले रे! पानी ला रे!
कहते भगवन थोरा-थोरा,

  कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

दौड़-भाग रे! पाती आई 
डकिया बाबू पास बुलाई, 
पढ़ दे पतिया बाबू मोरी 
धड़के जियरा, थोड़ा मोरा 

कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

बाबू पढ़ रहे पाती मोरी 
कह परनाम जो इच्छा तोरी,
सूचित करत हैं मोरी बिंदिया 
घटना सही है तोरी किरिया। 

कहते-कहते बाबू अटके 
पाती फार, धरती पर पटके 
कहते बिंदिया, दुःखद ख़बर है 
तेरा नाही गुज़र-बसर है 
आगे पात न पढ़ पाऊँगा 
दुख के गीत न मैं गाऊँगा। 

इतना कहकर मौन भये 
डकिया बाबू बेचैन हुए। 

कह दो बाबू जो कहना है 
तोड़ूँ चूड़ी क्या जो पहना है!

मैं वीर सपूत की नारी 
सुख-दुःख ना अब हमपर भारी 
लड़ते हैं सीमा पर सजना 
आगि लगी काहे मोरे अँगना!
गोली खायें वे ढेंगलायें 
मारि-मारि मैं जाऊँ संगना!

मृत तो हुई उसी दिन मैं न
रिश्ता जोरा उनसे रैना 
चिता फूँक रही देर-सवेरे 
चिंतामुक्त हुई हूँ मैं न!

'एकलव्य' 
बाट = प्रतीक्षा 
   "साहित्य एक क्रांति है न कि मनोरंजन का केवल एक माध्यम"  
           

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

वैश्या कहीं की ! ( लघुकथा )

                                         



 वैश्या कहीं की !  ( लघुकथा )


"अरि ओ पहुनिया!"
""करम जली कहीं की!"
"कहाँ मर गई ?"
"पहिले खसम खा गई!"
"अब का हम सबको खायेगी!"
"भतार सीमा पर जान गँवा बैठा, न जाने कउने देश की खातिर!"
"अउरे छोड़ गया ई बवाल हम पर!"
कहती हुई रामबटोही देवी अपनी बहुरिया पहुनिया को दरवाज़े पर बैठे-बैठे चिल्लाती है। 

"का है ?" 
"काहे सुबहे-सुबहे जीना हराम करे पड़ी हो ?"
"चूल्हा जलाती होगी बेचारी!"
"तुमसे तो कउनो काम होता नहीं!"
"अउरे जो कर रहा है, उसका भी करना मुहाल करे रहती हो!"
अपना चिलम फूँकते हुए छगन महतो अपनी अधेड़ स्त्री को दो टूक सुनाते हैं। 

"हाय-हाय!"
"ई बुढ़वा को सभई दोष हमरे ही किरिया-चरित्तर में दिखता है!"
"अपने बहुरिया की छलकती हुई जवानी में कउनो खोट नाही दिखाई देता तुमका!"
"अरे आजकल ऊ झमना लोहार के लड़िकवा दिन-रात इहे दरवज्जे पर पड़ा रहत है!"
"और तो और, ई छम्मक-छल्लो ओकरी आवाज़ सुनकर दरवज्जे पर बिना घूँघट के मडराने लगती हैं!"
"वैश्या कहीं की!"      
बकबकाती हुई रामबटोही दरवाज़े पर खड़े बैलों को चारा खिलाने लगती है। तभी अचानक एक करुणभरी चीख़ दरवाज़े से होते हुए ओसार तक पहुँचती है। छगन महतो चीख़ सुनकर अपना चिलम छोड़, दौड़े-दौड़े दरवाज़े की तरफ़ आते हैं जहाँ बैलों ने रामबटोही को ज़मीन पर पटक दिया था, और वो बदहवास छितराई पड़ी थी।

"अरे ओ पहुनिया!"
"तनिक दौड़ जल्दी!"
"देख, तुम्हरी सास को बैल ने पटक दिया!" कहते हुए छगन महतो मंद-मंद मुस्कराते हुए ओसार में जाकर अपना चिलम फूँकने लगते हैं और अपना मुँह ओसार की छत की ओर कर धुँआ निकालते हुए मानो जैसे कह रहे हों "शठे शाठ्यम समाचरेत!"


           

लेखक: ध्रुव सिंह 'एकलव्य'   

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

''अर्जुन सागर' नवोदय सम्मान"




 ''अर्जुन सागर' नवोदय सम्मान" 



नवोदय साहित्यिक एंव सांस्कृतिक मंच, साउथ सिटी, लखनऊ ने आज 22-12-2019 को, गुलमोहर ग्रीन स्कूल, ओमैक्स सिटी, शहीद पद, रायबरेली, लखनऊ के आडीटोरियम में, आचार्य ओम नीरव की अध्यक्षता में *नवोदित* कवियों को "राम कुमार सरोज 'अर्जुन सागर' सम्मान" से कु आयुषी पाल,ध्रुव सिंह 'एकलव्य', प्रान्जुल अष्ठाना, संजीत सिंह 'यश', कु सौम्य मिश्र 'अनुश्री', अरुण कुमार वशिष्ठ, सुरेश कुमार राजवंशी, संदीप अनुरागी, श्रीमती पायल भारती, अम्बरीष मिश्र, संजय समर्थ एवंम कु श्वेता को सम्मानित किया गया। आज के समारोह के मुख्य अतिथि सरवर लखनवी, नवोदय उपाध्यक्ष कृपा शंकर श्रीवास्तव विशिष्ठ अतिथि ओम प्रकाश 'नदीम' एंव मन मोहन भाटिया'दर्द'। मंच संचालन श्री शिव मंगल सिंह 'मंगल' द्वारा किया गया। सरस्वती वंदना ....द्वारा, धन्यवाद प्रस्ताव महेश अष्ठाना 'प्रकाश' द्वारा।

सम्माननित नवोदित कु आयुषी पाल,ध्रुव सिंह 'एकलव्य', प्रान्जुल अष्ठाना, संजीत सिंह 'यश', कु सौम्य मिश्र 'अनुश्री', अरुण कुमार वशिष्ठ, सुरेश कुमार राजवंशी, संदीप अनुरागी, श्रीमती पायल भारती, अम्बरीष मिश्र, संजय समर्थ एवंम कु श्वेता,व अन्य वरिष्ठ कवि ओम नीरव, कृपा शंकर श्रीवास्तव'विश्वास, 'सरवर लखनवी, ओम प्रकाश नदीम, शिव मंगल सिंह'मंगल', प्रेम शंकर शास्त्री 'बेताब', सच्चिदानंद शास्त्री, मन मोहन भाटिया 'दर्द', डा. करुणा लता सिंह, विभा प्रकाश, महेश अष्ठाना'प्रकाश', बेअदब लखनवी, पूर्णिमा बर्मन,.श्री कांत तैलंग, निशा सिंह, सुभाष चन्दर् रसिया, सम्पत्ति कुमार मिश्र 'वैसवारी' व आदित्य सरन द्वारा विशेष कविता-पाठ किया गया। कार्यक्रम का छायांकन एंव वीडियोग्राफी आदित्य सरन द्वारा की गई।
काव्यपाठ के उपरांत संस्था के महासचिव महेश अष्ठाना 'प्रकाश' ने सभी का आभार व्यक्त किया।

''अर्जुन सागर' नवोदय सम्मान" 

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

नारी सशक्तिकरण! ( लघुकथा )





नारी सशक्तिकरण! ( लघुकथा )


"रामकली!
"अरी ओ रामकली!"
"पकौड़े ला रही है या बना रही है!"
"ये निठल्ली मुई, एक काम भी समय से नहीं करती है!"
कहती हुई भावना अपनी नौकरानी रामकली पर खीझती है।

"छोड़ यार!"
"इधर मन लगा!"
"देख तू फिर से हार जायेगी!"
"नहीं तो!"
"चल, अपने ताश के पत्ते संभाल!"
कहती हुई भावना की सहेली शिखा ताश के पत्तों को बड़ी ही दक्षता से एक माहिर खिलाड़ी की तरह बाँटती है।

"मेरी अगली चाल सौ की!"
कहते हुए भावना सौ रुपये का नोट टेबल पर पड़े ताश के पत्तों पर दनाक से फेंक देती है।

"क्या यार, कर दी न छोटी बात!"
"अरे, इतने बड़े अफ़सर की बीबी है और तो और नारी सशक्तिकरण मंच की अध्यक्षा भी!"
"और टेबल पर बस सौ रुपये!"
"थोड़ा बड़ा दाँव लगा!"
कहती हुई भावना की सहेली पुष्पा अपने जूड़े को अपने हाथों से समेटने लगती है।

चाय की चुस्की लेते हुए शिखा,
"अरे यार, ये बता!"
"हमारी नारी सशक्तिकरण मंच वाली पार्टी कहाँ तक पहुँची ?"
तिरछी नज़रों से देखते हुए भावना की ओर प्रश्न दागती है।

"कह तो दिया है इनसे कि मल्होत्रा जी का रॉयल पैलेस देख लें और बुक कर दें, अगले रविवार के लिये!"
गहरी साँस लेते हुए भावना उसे तसल्ली देती है।

"अरे, मंच के लिये कोई धाँसू कविता तैयार की है कि नहीं ?"
"पिछली दफा तेरी वो भूखे-नंगों वाली कविता ने तो पूरे महफ़िल में कोहराम मचा दिया था!"
"और वो रेप वाली लघुकथा, उसने तो सबकी आँखों में आँसू ही ला दिये थे!"
शिखा, भावना को दो फुट चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए नमक़ीन के कुछ दाने अपनी मुठ्ठी में भर लेती है। तभी रामकली पकौड़ों का प्लेट लेकर रसोईं से टेबल की ओर बढ़ती है।

"अब क्या होंगे तेरे ये पकौड़े ?"
"हमारी चाय तो कब की ठंडी हो गयी!"
"तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता!"
"चल जा यहाँ से!"
भावना उसे खरी-खोटी सुनाते हुए जाने के लिये कहती है। परन्तु न जाने क्या सोचकर रामकली वहीं उसी टेबल के पास कुछ देर तक बुत बनी खड़ी रहती है।

"अब क्या है?"
"प्लेट रख, और जा यहाँ से!"
"क्यों खड़ी है मेरे सर पे ?"
सर पर हाथ रखते हुए भावना उसे फटकारती है।

"मालकिन, मेरे पोते का मुंडन है आज!"
"सौ रुपये मिल जाते तो!"
संकोच करते हुए रामकली कहती है।

"पैसे क्या तेरे बाप के घर से लाऊँ!"
"अगले महीने दूँगी!"
"काम करना है तो कर!"
"नहीं तो अपना हिसाब कर, और चलती बन!"
कहती हुई भावना, ग़ुस्से से उसे घूरती है। रामकली निरुत्तर-सी कुछ देर वहीं खड़ी रहती है और फिर अपना सर झुकाये वहाँ से चली जाती है।


लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'            
              

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

वे कह गये थे अक़्स से... ( 'नवगीत' )




वे कह गये थे अक़्स से...'नवगीत' )

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
मैं जा रहा हूँ, वक़्त से
नज़रे मिलाना तुम !

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
ख़ाक में, हूँ मिल गया 
ज़र्रा हुआ माटी, 
मेहनतों के बीज से  
फसलें उगाना तुम !

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

बह गई है शाम 
फिर अब न आयेगी, 
चिलचिलाती धूप में 
दीपक जलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

हो नहीं सकता ये रिश्ता 
बादलों से नेक,
कुएँ की नालियों से पेटभर 
पानी पिलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!


दीवारें हिल नहीं सकती हैं,  
काग़ज़ के पुलिंदों से  
सितमग़र वे रहेंगे बाग़ में 
मरहम लगाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!


नृत्य करता मोर है 
कहते रहेंगे वो,
काम है उनका, 
हमेशा का यही हर-रोज़
      सर बाँधकर पैग़ाम यह,      
सबको बताना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

सरताज़ हैं, सरकार हैं 
हर ताज़ पर काबिज़,
हर रोज़ ढलती शामों की 
क़ीमत चुकाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
बोतलों को मुँह में भर 
जो लिख रहे कविता, 
फूस की रोटी जली 
उनको खिलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

'जयशंकरों' की भीड़ में ग़ुम 
सत्य का साहित्य
'प्रेम' का साहित्य है
उनको बताना तुम! 

वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
मैं जा रहा हूँ, वक़्त से
नज़रे मिलाना तुम !

'एकलव्य'

( मेरा यह 'नवगीत' कथासम्राट आदरणीय मुंशी प्रेमचंद जी को समर्पित है। )   

  

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

एन.आर.सी है कि बवाल ! (लघुकथा)



 एन.आर.सी है कि बवाल ! (लघुकथा) 


रामखेलावन, पैर पटकता हुआ अपने फूस की मड़ई में प्रवेश करता है और पागलों की तरह घर के कोने में पड़े जंग लगे संदूक को खोलकर जल्दी-जल्दी उसमें पड़े कपड़ों और पुराने सामानों को इधर-उधर मिट्टी के फ़र्श पर फेंकते हुए चींख़ता है,

"अरे ओ नटिया की अम्मा!"
"मर गई का!"
"कहाँ है ?"
"ज़ल्दी इधर आ!"

फूलन देवी अपनी साड़ी के पल्लू को संभालती हुई रसोईं से अपने पति रामखेलावन की ओर दौड़ती हुई,

"का हुआ ?"
"काहे आसमान फाड़ रहे हो!"
"अउर ई का!"
"ई का कर रहे हो ?"       
"भाँग-वाँग खा लिये हो का!"   
"सारा सामान ज़मीन पर काहे फेंक रहे हो ?"
"का चाहिये तोका ?"
"हमसे कहते, हम निकाल देते।"
फूलन, रामखेलावन पर चिल्लाती हुई अपनी साड़ी के पल्लू को आटे लगे हाथों से ठीक करती है,
"का हुआ ?"
"इतना काहे सुरियाये हो!"

"अरे गज़ब हो गवा!"
"ऊ ससुरा एन.आर.सी आवे वाला है!"
कहता हुआ रामखेलावन अपने कंधे पर रखे मैले गमछे से अपने माथे का पसीना पौंछता है।
"अरे आज मुखिया जी पंचायत बुलाये रहे।"
"वे कह रहे थे कि एन.आर.सी ससुर आ धमका है!"
"सबही गाँव वाले अपना-अपना पहचान-पत्र और कउनो ज़मीन के काग़ज़ तैयार रखें!"
"नाही तो गाँव से उसका हुक़्क़ा-पानी सबही बंद कर दिया जायेगा और गाँव से बाहर निकाल दिया जायेगा!"

"अरे, कइसे निकाल देंगे हमको!"
"हमरे बाप-दादा यहीं रहे हमेशा और हमें कइसे निकाल देंगे!"
"का कउनो हलुआ है का!"
"अउर सभही का यही रहेंगे ?"
कहती हुई फूलन अपना विरोध दर्ज़ कराती है।

मुखिया जी कह रहे थे कि-
"केवल ज़मींदार साहेब!"
"लाला जी!"
"अउरो ऊ पुरोहित जी!"
"ई गाँव में रहेंगे!"
कहते हुए रामखेलावन पश्चातापभरी आँखों से फूलन को देखता रहा।

"अरे, ई का!"
"काहे ऊ काहे रहेंगे ?"
"उनही के बाप-दादा खाली चमेली का तेल अपने उजड़े चमन में लगाये रहे का जो सारे गाँव में अब तक महक रहा है!"
रामखेलावन फूलन को समझाता हुआ-
"अरे नाही!"
"ई बात नहीं है!"
"असल में उनके बाप-दादा पढ़े-लिखे रहे, सो उनके पूरे ख़ानदान का नाम गाँव के पंचायत-भवन के रजिस्टर में मौज़ूद रहा!"

"हम सब ठहरे अँगूठा-टेक!"
 "अउर का!"

"तो का मतबल!"
"हमार नटिया भी गाँव में न रहेगी!"
फूलन के इस मासूम से सवाल पर रामखेलावन सजल आँखों से उसे एक टक देखता रह गया!                                   

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

दो लघुकथाएँ

छुटकारा ( लघुकथा )


"बोल-बोल रानी! कितना पानी ?
 नदिया सूखी, भागी नानी।" 
कहते हुए ननुआ मदारी अपने बंदर और बंदरिया को अपनी पीठ के चारों ओर घुमाता हुआ, "क़दरदान !  मेहरबान! अपनी झोली खोलकर पैसा दीजिए! भगवान के नाम पर, इन मासूम खिलाड़ी बंदर-बंदरिया की रोज़ी-रोटी के वास्ते! दीजिए! दीजिए!
साहेबान!
निग़हबान!
चलो भईया! आज का खेल यहीं ख़त्म!'' कहते हुए ननुआ मदारी अपना करामाती थैला समेटता है और घर की ओर अपने बंदर-बंदरिया को लेकर चल पड़ता है। घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही उसको उसकी माँ की दर्दभरी खाँसी सुनायी देती है और वह जाकर उसके सिरहाने यह कहते हुए बैठ जाता है कि,

''माँ कल थोड़े पैसे और हो जायें तो तुझे अच्छे डॉक्टर को दिखाऊँगा।"  
इधर ननुआ की बंदरिया भी कुछ दिनों से बीमार चल रही थी जिसके सर को उसका बंदर अपनी गोद में रखकर सहला रहा था और ननुआ की अपनी माँ से वार्तालाप भी बड़े ध्यान से सुन रहा था। दूसरे दिन ननुआ यह जानते हुए कि उसकी बंदरिया बहुत बीमार है, दोनों को लेकर खेल दिखाने निकल गया। 
साहेबान!
क़दरदान! 
अब देखिये, मेरा बंदर अपनी बंदरिया को गोली से उड़ा देगा !
''ठाँय-ठाँय !"
बंदरिया ज़मीन पर गिर पड़ी। बंदर ने उसे कफ़न ओढ़ाया । साहेबान!
क़दरदान!
"अब देखिए हमारा बंदर अपनी बंदरिया को कैसे जीवित करता है।''

ननुआ का बंदर अपनी बंदरिया को उठाने के लिये झिंझोड़ने लगा। बंदरिया दोबारा नहीं उठी। संभवतः उसे अपने रोज़-रोज़ के झूठ-मूठ के मरने से सच में छुटकारा मिल चुका था। बंदर वहीं अपनी बंदरिया की लाश के पास बैठा-बैठा आसमान की ओर निःशब्द, निर्निमेष देख रहा था मानो वह अपनी बंदरिया की आत्मा को महसूसकर  मन ही मन कह रहा हो-
"चलो अच्छा हुआ, तुझे कम से कम इस नरक से छुटकारा तो मिला!''



ठेठ पाती ( लघुकथा ) 

"सुनो!
सुनो!
सुनो!"

''सभी गाँव वालों ध्यान से सुनो!"
"विधायक जी ने गाँव की महिलाओं और लड़कियों हेतु एक 'चिट्ठी लिखो प्रतियोगिता' का आयोजन किया है।" "जीतने वाली प्रतिभागी को हमारे विधायक जी स्वयं पंद्रह अगस्त को एक हज़ार रुपये की पुरस्कार राशि से पुरस्कृत करेंगे।"
"सुनो!
सुनो!
सुनो!"
कहते हुए नेताजी का संदेशवाहक अपनी टुटपुँजिया साइकिल अपने बलपूर्वक खींचता हुआ गाँव के बाहर निकल गया। 
"अरे ओ परवतिया!"
"सुनती है!"
"देख गाँव में कउनो खेला होने वाला है।"
"तुम भी काहे नहीं चली जाती!"
कहते हुए परवतिया के ससुर अपना ख़ानदानी हुक़्क़ा गुड़गुड़ाने लगते हैं। 
"ठीक है!"
"सुन लिया!"
"मैं कल पंचायत-भवन में चली जाऊँगी अपना बोरिया-बिस्तर लेकर।"
कहती हुई परवतिया बैलों की नाद में भूसा डालने लगती है। 
दूसरी सुबह परवतिया गाँव के पंचायत-भवन पहुँचती है जहाँ और बाक़ी महिलाएँ आयोजनकर्मियों द्वारा दिये गये काग़ज़ पर कुछ लिखने में व्यस्त थीं। परवतिया कुछ समझ पाती उसके पहले ही एक कर्मी ने उसके हाथों में एक सादा काग़ज़ और क़लम पकड़ाते हुए दूसरे कोने में बैठ जाने का इशारा करता है और कहता है कि-
''देश के विकास के नाम एक पाती लिखो!"
परवतिया कुछ सोचती हुई पंचायत-भवन के एक कोने में जा बैठती है और अपनी टूटी-फूटी भाषा में कुछ लिखने लगती है। 
"पणाम! हम कहे रहे, इहाँ सबहि ठीक बा" 
हऊ केदार राम के गदेलवा विकशवा, मुआं 
कबही से बेमार रहा। कलिया बता रही थी कि, ऊ मुआं झोलाछाप वैद्यवा के कारन विकशवा का तबियत ढेर ख़राब हो गवा रहा!"
"तबही नये वैद के यहाँ ओकरी माई ले गयी रहिन!"
"आज भोरहरी ओकर मृत्यु हो गयी रही!''
"सुनने में आ रहा था कि ई नया वैद दवाई का तनिक बेसी ख़ुराक़ दे दिआ रहा!"
"बाक़ी सबहि कुशल मंगल! हमरी बकरिया छबीली, कलही से पानी नाही गटक रही है!
"बाक़ी खबर आने पर पता लगेगा!"

"तुम्हरे चरनों की धूल!"
परवतिया 

ध्रुव सिंह 'एकलव्य'