आपका स्वागत है।

बुधवार, 16 मई 2018

चार पाए




घर के कोने में 
बैठा-बैठा फूँक रहा हूँ,
उस अधजली सिगरेट को। 

कुछ वक़्त हो चला है,
फूँकते-फूँकते
धूम्र-अग्नि से बना 
क्षणिक मिश्रण वह। 

डगमगा रहे हैं पाए 
कुर्सी के 
बैठा हूँ जिसपर,
कारण वाज़िब है ! 

तीन टाँगों वाली,वह कुर्सी 
बैठकर सोचता हूँ मैं,
जीवन के वो हसीन पल !
फेरता हुआ पकी दाढ़ी पर 
हाथ अपने। 

उखाड़ता हूँ,रह-रहकर 
कुछ बाल पके-से 
छुपाने हेतु,
अपने उम्र की नज़ाकत !
मरते थे दुनियावाले जिसपर। 

तब बात भी कुछ और थी 
उस कुर्सी की। .... 

हिलती नहीं थी इतनी,
सिगरेट के प्रत्येक कश पर 
ज़ाहिर है !.... 

रहे होंगे 
चार पाए उसके 
जीवित !
मेरी जिंदगी की तरह..... ।  

( निराशा के भंवर में फँसा मैं ! )


'एकलव्य' 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

स्वप्न में लिखता गया कुछ पंक्तियाँ !

क्या करूँगा ! ये ज़माना रुख़्सत करेगा 
चस्पा करेगा गालियाँ मुझपर हज़ारों। 

कुछ कह सुनायेंगे, तू बड़ा ज़ालिम था पगले !
कुछ होके पागल याद में,नाचा करेंगे। 


मैं जा रहा हूँ ज़िंदगी 
तूँ लौट आ !
गा रहा हूँ गीत जीवन 
धुन बना !

मर रहा हूँ 
मैं जो प्रतिक्षण 
दोष मेरा 
इल्तिज़ा तुझसे है बाक़ी 
मान जा !

कुछ फूँकते शहनाईयाँ 
क़ब्र पर मेरे, 
नापसंद यह धुन मुझे 
अब क्या करूँ ?
कहकर विदाई दे रहे 
अंतिम यहाँ। 


सोया पड़ा हूँ 
देखकर 
चिल्ला रही माँ। 
मिन्नतें कर-करके हारी 
फुसला रही माँ। 
लाल उठ जा ! भोर हुई 
बतला रही माँ। 
देर तक सोना नहीं !
समझा रही माँ। 

पर क्या करूँ !
अशक्त-सा 
मैं हूँ पड़ा। 

चादर ओढ़ाते देखकर 
घबरा रही माँ। 
मुझको लिटाते, सोचकर 
गंगा बहा रही माँ। 
बाँस की तख़्ती पर पसरा 
तकिया लगा रही माँ। 

चार कांधे तैयार हैं 
ढोने को मुझे हो नग्न से !
खींच-खींच तख़्ती मेरी 
बिठा रही माँ। 

जूठे पड़े हैं बर्तनों के ढेर-से 
आज ख़ुश हूँ देखकर 
क्यूँ रो रही माँ ?
⧫  

वक़्त आ गया है,चलने का मेरे 
छोड़ माँ ! तख़्ती मेरी 
फिर लौट आने के लिए। 

सोच ले ! तूँ फिर झुलाएगी मुझे 
डोरियों में हाँथ बाँधे,स्वप्न-सा। 
⧫   

मैं फिर से मुँह में भरकर माटी खाऊँगा। 
भागेगी मेरे पीछे तूँ बन पगली-सी  
दीवारों की ओट में छिप जाऊँगा। 

रोने का नाटक करेगी, झूठी तूँ  
मोम-सा हृदय मैं पिघलाऊँगा। 

चिपकाऊँगा नन्ही उँगलियाँ,नेत्रों पर तेरे
पूछूँगा ! मैं कौन हूँ ? बतलाऊँगा। 

आँगन में पुनः मैं 
लाल बनकर आऊँगा।    

                                 'एकलव्य' 

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

मच्छर बहुत हैं !

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 
बात कुछ और है 
उनकी गली की !

लिक्विडेटर लगाकर सोते हैं वे 
भेजने को गलियों में मेरे 
क्योंकि !
संवेदनाएं न शेष हैं ,अब 
मानवता की। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

पानी ही पानी रह गया 
घुलकर रसायन रक्त में 
अब कह दिया है 
छोड़ने को 
गालियाँ जो उनकी 
थीं कभी
उन मच्छरों से। 

क्या करूँ,
दिल है बड़ा 
मेरा अभी भी 
अंजान मेहमानों के लिए 
सो मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

चूसना है 
चूस लो !
ऐ उड़ने वालों 
फ़र्क क्या ? 
उनकी गलियों के निवासी 
तुम थे कभी। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

धीरज धरो ! तुम ना डरो 
जेब है ख़ाली मेरी। 
अशक्त हूँ और त्रस्त भी 
उनकी कृपा है। 

'लिक्विडेटर' ,बात छोड़ो !
रोटी के लाले पड़े हैं। 
श्वास जब तक
है भरोसा !
मेरी रहेंगी सर्वदा 
गालियाँ खुलीं। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

मत लजाना ! 
रोज आना  
रक्तपान कर 
तृप्ति पाना। 
जो मिले 
उनको भी लाना।   

हा ....हा ... हा।  
क्या करूँ ?
मच्छर बहुत हैं, आजकल
गलियों में मेरे।  

"एकलव्य" 
छायाचित्र :साभार गूगल 

सोमवार, 29 जनवरी 2018

मैं हूँ अधर्मी !


 मैं हूँ अधर्मी !

 तैरती हैं झील में 
वे ख़्वाब जो धूमिल हुए। 
कुछ हुए थे रक्तरंजित 
सड़कों पर बिखरे पड़े। 

चाहता धारण करूँ 
शस्त्र जो हिंसा लिए 
याद आते हैं, वे बापू 
स्नेह जो मन में भरें। 

भूख भी तांडव मचाती 
रह-रहकर पापी उदर में 
हूँ विवश,करने को कर्म 
नैतिक प्रकृति से परे। 

कल काटता हांसिये सहारे 
उग गए जो खेत में 
कट गए अब स्वप्न सारे 
शेष से बस खूँट हैं। 

जन्मा नहीं था, मैं अनैतिक 
नैतिक ही था बस रक्त में 
'करवटें' परिस्थितियों की ऐसी 
खींच लाया 'नर्क' में।

पूजता था, मैं भी पत्थर
 इष्ट उनकों मानकर 
जल चढ़ाता ,तिल गिराता 
भावभीनी  स्नेह से। 

विमुख नहीं, मैं आज भी हूँ 
कट्टर पुजारी धर्म का। 
एक 'अनुत्तरित' प्रश्न भी है 
मुझको बता दो !
धर्म क्या ?

ज्ञान मेरा, हुआ विस्तारित 
धर्म क्या ?
अधर्म क्या ?
मैं तो जानूँ , धर्म मानव !
भेद तो तुमने किया। 

सोता हूँ, मैं 
धर्म है !
रोता हूँ, मैं
धर्म है !
खाता हूँ ,मैं 
धर्म है !
स्नेह मुझको तुमसे है 
यह धर्म है ! यह धर्म है !
कल गिरे थे, तुम सड़क पे 
तुमको उठाया। 
धर्म है !
भूख से वो मर रहा 
रोटी खिलाया। 
धर्म है !

विचलित हुआ इनसे कभी 
अधर्म है ! अधर्म है !

अब बता ! मुझको अभी 
तूं किस माटी का धर्म है ?
ना मैं हिन्दू !
ना मैं मुस्लिम !
मानवता ही धर्म है !
केवल यही एक 'मर्म' है।
फिर भी पूजे, पुतले बनाकर
माटी से है, जो बना 
पानी पी-पी धर्म बताए 
बन अशक्त-सा 
मैं खड़ा। 

समझ न पाया सदियों से 
शाश्वत स्वभाव ही 
धर्म है ..... !

( हाँ ! मैं हूँ अधर्मी। )

"एकलव्य"











शनिवार, 13 जनवरी 2018

जीवित स्वप्न !

 जीवित स्वप्न !


चाँद के भी पार होंगे 
घर कई !
देखता हूँ रात में 
मंज़र कई 

चाँदी के दरवाज़े 
बुलायेंगे मुझे 
ओ मुसाफ़िर ! देख ले 
हलचल नई 

वायु के झोंकों से 
खुलेंगी खिड़कियाँ जो 
स्वर्ण की !
पूर्ण होंगी, स्वप्न की वो तारीख़ें 
अपूर्ण सी ! जीवन में 
बनकर रह गईं। 

चाँद के भी पार होंगे 
घर कई !

सूख सी रोटी गई है 
थाल में 
उम्मीद की गर्मियों से 
ताज़ी हो गईं। 

देखता हूँ रात में 
मंज़र कई 
चाँद के भी पार होंगे 
घर कई !


"एकलव्य" 

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

"फिर वह तोड़ती पत्थर"


"फिर वह तोड़ती पत्थर"

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
'इलाहाबाद' के पथ पर

दृष्टि परिवर्तित हुई
केवल देखने में
दर्द बयाँ करते
हाथों पर पड़े छाले
फटी साड़ी में लिपटी
अस्मिता छुपाती
छेनी -हथौड़ी लिए
वही हाथों में,
दम भर
प्रहार कर

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
इलाहाबाद के पथ पर

परिवर्तित स्थान हुआ
इलाहाबाद से प्रस्थान हुआ
शेष नहीं वह पथ
जिस पर
तोडूं मैं पत्थर

अब तोड़ने लगी हूँ
जिस्मों को
उनकी फ़रमाईशों से
भरते नहीं थे पेट
उन पत्थरों की तोड़ाई से

अंतर शेष है केवल
कल तक तोड़ती थी
बेजान से उन पत्थरों को
अब तोड़ते हैं वे मुझे
निर्जीव सा
पत्थर समझकर

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
इलाहाबाद के पथ पर

कोठे पर बैठी 
फ़ब्तियाँ सहती हुई 
समाज की कुरीतियों से 
जख़्मी मगर 
कुचली जाती 
लज्जा मेरी 
शामों -पहर 
गिरते नहीं हैं 
अश्रु मेरे 
यह सोचकर 

कल तक 
तोड़ती पत्थर 
उसी इलाहाबाद के पथ पर 
जहाँ 'महाप्राण' छोड़ आए 
मुझको सिसकता देखकर 

सत्य ही है आज 
मैं तोड़ती नहीं 
पत्थर 
उस दोपहरी में 
तपते सड़कों पर 
किन्तु जलती 
आज भी हूँ 
अपनी हालत 
देखकर 

हाँ ! मैं  
तोड़ती थी 
पत्थर 
जिसे तूँ खोजता है 
आज 
इलाहाबाद के 
पथ पर 

वह तोड़ती पत्थर
आज फिर से खोजता हूँ
इलाहाबाद के पथ पर 

( उन मंज़िलों के इंतज़ार ने ,कद मेरा छोटा किया )
प्रश्न है "महाप्राण" से  

 "एकलव्य"


शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

''अविराम लेखनी''


''अविराम लेखनी'' 


लिखता जा रे !
तूँ है लेखक 
रिकार्ड तोड़ रचनाओं की 
गलत वही है 
तूँ जो सही है 
घोंट गला !
आलोचनाओं की 
पुष्प प्रदत्त कर दे रे ! उनको 
दिन में जो कई बार लिखें 
लात मार दे ! कसकर 
उनको 
जीवन में एक बार 
लिखें 
लिख -लिख पगले 
भर -भर स्याही 
जब जी चाहे छाती पे 
लगा -लगा कर धूम मचा दे 
सौ टिप्पणियाँ 
'राही' की 
सोच न उनको, जो हैं लिखते 
सत्य काव्य सा अनुभव को 
वो हैं मूरख, सोचने वाले 
करते बातें मानव की 
लिखता जा अविराम लेखनी 
लिखने का तूँ आदी है 
कर दे तूँ सूर्यास्त साहित्य का 
तुझमें हिम्मत बाक़ी है !

आज लिख रहा तेरी महिमा 
अनपढ़ सा मैं सोचने वाला 
वाह रे ! फ़कीर जो तूने किया  
साहित्य समाज का सच्चा रखवाला 


( दिन में सौ रचनायें लिखने वाले सम्माननीय लेखकों को "एकलव्य" का दंडवत नमन। )


"एकलव्य"