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शुक्रवार, 10 मई 2019

आपसभी प्रतिभाशाली रचनाकारों से पत्रिका के आगामी अंक हेतु आपकी मौलिक रचनाएं आमंत्रित करती है।



आवश्यक सूचना :

सभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों को सूचित करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि अक्षय गौरव ई -पत्रिका जनवरी -मार्च अंक का प्रकाशन हो चुका है। कृपया पत्रिका को डाउनलोड करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर जायें और अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाने हेतु लिंक शेयर करें  ! सादर      
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ई-पत्रिका "अक्षय गौरव" आप सभी रचनाकारों एवं सुधि पाठकों का साहित्य सृजन के अभिनव प्रयोग एवं आयोजन में स्वागत करती है एवं आपसभी प्रतिभाशाली रचनाकारों से पत्रिका के आगामी अंक हेतु आपकी मौलिक रचनाएं आमंत्रित करती है।
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

RISING AUTHOR AWARD 2019




आप सभी गणमान्य पाठकों एवं मित्रों को सूचित करते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि इस वर्ष अक्षय गौरव पत्रिका के RISING AUTHOR AWARD 2019 का ख़िताब मुझे दिया गया है। आप सबके सहयोग हेतु धन्यवाद ! सादर 
'एकलव्य' 


सोमवार, 7 जनवरी 2019

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार: हिंदी साहित्य की ऑनलाइन पत्रिका hindi literature online magazine



लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन २०१९ में मेरी तीन लघुकथाएं :
१. मटमैला पानी, 
.''गिरगिट''
३. नौटंकी, 
दिए गए लिंक पर जाकर पढ़ें !  सादर 
                                                 
                                                           'एकलव्य' 





रविवार, 30 दिसंबर 2018

छद्दम वर्ष....



ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

बीत गईं, अब साँझ नई
लेकर आई है राग वही
बन नवल रात्रि में स्वप्न नये
कल नया सवेरा लाता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

वर्षों बीते,सदियाँ बीतीं
गंदले इतिहास के पन्नों में
कुछ जीर्ण-शीर्ण, कुछ हरे-भरे
उन जख़्मों को सहलाता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

प्रण धुँधला है और संशय भी
दृग-विहल अश्रु-सा कल-कल भी
तारीख़ें फिर-फिर आयेंगी
बनकर स्मृतियों-सा अनल समीर

मैं सूतपुत्र हूँ, कर्ण सही
कर्तव्य-अश्व  दौड़ाता हूँ।

नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

राजा ना हूँ मैं, प्रजा सही
कीचड़, मस्तक-तन सना सही
हल हाथों, न कोई खंज़र है
भूखी जनता हर घर-घर है
स्वप्न नये हैं , पौध यही
क्यारी-क्यारी बिखराता हूँ।

नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

अब दूर नहीं आशा अपनी
हर बोली है , भाषा अपनी
मैं भारत हूँ , न धर्म कोई
हों द्वेषविहीन, न मर्म कोई
हो नये वर्ष का धर्म यही
हाथों में तिरंगा ले-लेकर
बन नया वर्ष फहराता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ... 
नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...      

'एकलव्य' 

  ( प्रकाशित :  अंक 53, जनवरी(द्वितीय), 2019 साहित्यसुधा  )





शनिवार, 15 दिसंबर 2018

आभासी क्षितिज

( वर्तमान समय में पति-पत्नी के रिश्तों में शून्य होता प्रेम ! )



म थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

स्नेह नया,वह साँझ नई
उर आह्लादित उम्मीदों को
कर बाँधा था उसके कर से
मन विलग रहा, पर-सा मन को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

तैरा करते थे स्वप्न बहुत
कुछ मेरे लिए ,थोड़ा उनको
जीवन चलता,चरखा-चरखा
डोरी कच्ची है कातने को
मैं मानता ! गलती मेरी थी
स्नेह अधिक था पाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

था क्षितिज, जो नभ में दौड़ रहा
हम दौड़ रहे अपनाने को
सौगंध थी जीने-मरने की
जीवित हैं केवल जीने को
मरने तो लगे दोनों प्रतिक्षण
मैं 'मैं' हूँ, केवल मैं ही रहूँ
'पर' से जग में दिखलाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

स्मरण बहुत ही आते हैं !
जब हम थे,'मैं' का गमन रहा
ज्वर में मैं दर्द से ग्रसित रहा
बन ताप-सा तुझको आता था
गीली पट्टी और लेप लिए
माथा तेरा सहलाता था
घर के कोने अब लस्त पड़ा !
अश्रु कहते हैं आने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

चिट्ठी-पाती से भिजवाया 
तूने कहकर ,तू अलग रहे 
तब जोड़े थे उस अग्नि से 
यह रिश्ता अपना अलख रहे 
क्या भूल थी यह हम दोनों की !
कुछ मीठे सपने पाने को 

क्यूँ थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...?

वो पल थे, जब तुम होती थी
बनकर जीवन की आशा-सी
रंगों को भरती सपनों में
नभ 'इंद्रधनुषी' काया-सी
ये पल है, जब तुम 'काज' बनी
मेरी बदरंगी दुनिया की !
दुनियावाले बस कहते हैं
रिश्तों का नाम, निभाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

र्शकदीर्घा ने खींच दिया
ड्योढ़ी हुई सीमा अपनी
रिश्ते हैं, काँच-से टूट गए
कुछ शेष नहीं बतलाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

हते-कहते,अब 'मैं' ही हूँ
जीवन रस्ते ,विपरीत बनें
अब चलने को एकांत हमें   
भस्म हुए रिश्ते सारे 
बैठा 'मरघट' पछताने को 

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

'एकलव्य' 

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं



उड़ जा रे ! मन दूर कहीं 
जहाँ न हों,धर्म की बेड़ियाँ 
स्वास्तिक धर्म ही मानव कड़ियाँ 
बना बसेरा ! रैन वहीं 

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  

श्वास भरे ! निर्मल समीर से 
विद्वेष रहित हो,द्वेष विहीन 
शुद्ध करे जो आत्मचरित्र 
बस तूँ जाकर ! चैन वहीं    

 उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  

नवल ज्योति हो, नवप्रभात 
आत्मप्रस्तुति,कर सनात !
प्राप्त तुझे हो सत्य ज्ञान   
बुद्धरूपी ब्रह्माण्ड वहीं 

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  

कर स्पर्श करें जो नदियाँ
हृदय आनंदित,भाव-विभोर 
नभ संगिनी धरा मिली हो 
और मिलें हों  क्षितिज वहीं 

 उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...   

निष्पाप खग,प्राणी हों सुन्दर 
स्वर जो निकले,आत्मतृप्ति हो 
विस्मृत हों क्षण पीड़ा के 
खोज ! दिव्य स्थान कहीं 

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...   

( अक्षय गौरव पत्रिका में प्रकाशित ) 


                                                                       'एकलव्य' 

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

बैरी पाती



शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

स्वप्नचंद्रिका मिलने आई
प्रियवर तुमसे प्रीत लगाई
निशा पहर अब बीते दुख-सा
ग्रीष्म ऋतु बरसात बुलाई
स्मरण करूँ क्षण,नेत्र ही नम हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

गए पिया परदेस कमाई
एक युग बीता,पात न आई
संशय होता भूल गए तुम
गाँव बहे ठंडी पुरवाई
तन लागे, कंटक अनुभव हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

रोज निहारूँ डकिया बाबू
पूछूँ साहेब चिट्ठी आई
आस करूँ, वे कह दें हमसे
खाट बिछा ! मैं पानी लाई
कहते कह दूँ , पढ़ दो पाती !
प्रीत घुले मन ,तन शीतल हो

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

गाँव फसल अब दावन लागे 
मैं भी भर-भर भूसा लाई 
पर 'परजा' के फसल कट गए 
मेहनत मेरी 'गोरुअन' खाई 
साँझ चूल्हे मैं आग लगाऊँ, क्षुधा शांत और गुजर-बसर हो। 

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

बेर-बिसव चढ़ सूरज आया
दरवाजे कोहराम मचाया
लुकती-फिरती मड़ई में आई
पोंछ-पोंछ तन खूब नहाई
कहते चाचा,ओ री 'झमली' ! दौड़ी आ रे ! पाती आई
पढ़ दे बबुआ ! पाती मेरी, ठहर-ठहर मैं दौड़ी आई !
अनजाने तू कह दे मुझसे,वो आ रहे,स्वप्न सफल हो।

 शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

अब अधीर, अब और न पगली
धीरज धर ! ओ जल की मछली !
खोलन दे ! पतिया तो मुझको
बिन पढ़के क्या कह दूँ तुझको !
भाव मैं जानूँ मुखमंडल के,युग-युग का अवसाद महल हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

पढ़ते-पढ़ते हाथ से छूटा
'पात',पात से गिरकर टूटा
वाचन-वाचन रुध आया था
गला भाव से,आँख में फूटा
क्या कह दूँ ? ओ 'झमली' बता तू !
नाव बह रही ,पतवार गया डूब।
अब तू कहेगी मैं हूँ झूठा ,मुझ अनपढ़ को तुमने लूटा।

फिर भी कहूँगा,भूल जा उसको
'स्वर्ग' गमन में रूठ गया वो
शेष नहीं दुनिया में कोई
सात फेरों का किरिया-मंतर ,
क्षणभर में 'कुल' तोड़ गया जो
रो दे पगली ! भर-भर अंखियाँ ,तन पाषाण न बोझिल मन हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

कैसे भूलूँ ? डकिया बाबू !
रोते-रोते रात न सोई
दिन ढलता था,बाट में उसकी
स्मरण करूँ तब भर-भर रोई।

डूबूँ या उतराऊँ सागर
फरक पड़े क्या 'ढाई'-आखर
पाती-पाती ना कोई नाता
ना बाबू ! अब तुम न आना !
चिल्लाना न ! पाती आई
गाँव-गाँव चुपके से जाना
बिन बैरी अब मड़ई सूनी ,तन जीवित मन ,मृतप्राय सकल हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........


'एकलव्य' : प्रकाशित रचना 'साहित्यसुधा' वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर (प्रथम) , 2018 )

 
पाती - चिठ्ठी 
गोरुअन - मवेशी 
परजा - गाँव के लोग 
कुल -ख़ानदान ( परिवार )
बाट - प्रतीक्षा 
मड़ई - घास-फूस का घर  

                                                                                                छायाचित्र : साभार गूगल