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गुरुवार, 30 जनवरी 2020

ई ससुर, मुद्दा क्या है?





ई ससुर, मुद्दा क्या है?


मुद्दा ये नहीं,
कि मुद्दा क्या है!
मुद्दों पर चलने वाला,
अपना ही कारवां है। 

बनते हैं मुद्दे,
कारवां में भी 
मुद्दे पर मुद्दा,
बनाते हुए। 

तफ़्तीश करना मुद्दों की 
मुद्दा बड़ा अहम् है 
इस कारगुज़ारी में,
मिल गये हैं बंदर 
इसी मुद्दे की 
चारों बाँह पकड़कर। 

ख़तरे में है मुद्दा 
एक सौ पैंतीस करोड़ 
मुद्दों के लिये,
ख़तरे में हैं जिनके मुद्दे 
अभी केवल कुछ वर्षों से। 

मुद्दों के भी 
कुछ और मुद्दे हैं 
और हैं मुद्दों को बचाने वाले 
बचे हुए मुद्दों पर,
लाठी चलाने वाले मुद्दे। 

आवाम के वे सारे मुद्दे 
कौन अपने हैं?
और कौन हैं पराये?
कुछ मुद्दे तय करते हैं 
जो एक सौ पैंतीस करोड़ के 
मुद्दों से, मुद्दों पर बैठे हैं!

साहब! ये मुद्दा क्या है?
तनिक बताईए हमें!
इन मुद्दों की तासीर क्या है?

भारत एक ख़ोज!
अथवा ख़ाली एक मौज़!

सोज़ का विषय है!
ई ससुर, मुद्दा क्या है?

अरे साहब! 
मुद्दों की 'क्रोनोलॉजी' समझिए!
             
  
रेडीमेड कवि संगोष्ठी! 

हज़रतगंज के कवि मंच पर 
ख़ूब लगी थी भीड़,
कुछ बैठे अति काने-कौवे 
बाक़ी पीर-फ़क़ीर। 
कलुआ भागा, दौड़ा-दौड़ा 
कक्का के संग आया,
अपनी बारी में डंटकर 
ऐसा कोहराम मचाया। 

पास वहीं मंचित बैठे 
पुरखे फ़ौरन घबराये,
कलुआ की तीखी वाणी सुन 
भर, पात-पात मुरझाये।

बोले कक्का, 
रहने दे कलुआ!
तू काहे ऊधम मचाये!
जानती है जनता अपनी
फिर काहे व्यंग्य गँवाये!

उधर देख अब संचालक भी 
तुझसे हैं खुन्नश खाये। 
क्षणभर में नीचे आ जा तू 
क्यों भद्द अपनी पिटवाये। 

सुनकर बातें  तब कक्का की 
कलुआ थोड़ा तुनकाया 
ठहरो कक्का,धोती पकड़ो!
 कुछ मिनटों में मैं आया। 

ऊधम मचाता कलुआ भी 
अब थोड़ा ज़ोश में आया 
तेरी-मेरी अब ख़ैर नहीं,
कहता-कहता पगलाया!

उधर संघ के सानी सब 
अब लुटिया डूबी जानें,
करते-करते कानाफूंसी 
बस अपना बिस्तर बाँधे!

कुछ उनमें भी थे पगे हुए,
अब कलुआ रास न आया 
क्षण में मंच बना था रण 
मन देख-देख घबराया!

एक ने फेंका जूता अपना 
कलुआ पर निश्चित लक्षित कर 
पर भाग्य बड़ा ही खोटा था 
जूता जो गिरा कक्का के सर!

चीख़े कक्का, निज प्राण गया 
जीते-जी कलुआ मार गया 
तुझको क्या चुल्ल मची इतनी 
फ़ोकट में जीने का सार गया!

चीख़ें सुन कलुआ,कक्का की 
क्षण, अपना आपा खो बैठा
प्रतिशोध में अपने कक्का के 
ध्वनि-डंडी से सब धो बैठा!

विक्रालरूप देख, कलुआ का 
रस वीर कवि महोदय बोले,
मैं वीर हूँ केवल शब्दों का 
धीरे-धीरे कहते डोले!

प्रेमरसिक कविवर बोले,
मन भाँप श्याम, मन को तोले 
प्रियवर तुम तो सानी हो 
तुम केवल हिंदुस्तानी हो!

मैं तो ठहरा, एक प्रेम-पथिक 
शत्रु ना हूँ मैं, प्रेम-अडिग 

डग भरता सूनी गलियों में,
न गाता हूँ न रोता हूँ 
पिछला बसंत है स्मरण मुझे 
कलियाँ बसंत की आयीं थीं 
अब सूखी टहनी शेष बचीं 
बस रहतीं हैं परछाईं-सी!

छोड़ो मुझको, पकड़ो उसको!
है व्यंग्य कवि, तोड़ो उसको! 

प्रभु क्षमा करो अब तो मुझको!
न किसी मंच पर जाऊँगा 
जूता क्या, चप्पल खेत रहे 
नित्-नंगे पैर ही आऊँगा!

व्यंग्यों के बाणों-संग बैठा 
कुछ तोंद फुला, ऐंठा-ऐंठा,
तरकश शब्दों के साथ लिये 
अर्जुन-सा वीर बना बैठा!

भान मिज़ाज़ कलुआ-कक्का 
तोते-सी शक्ल बना बैठा 
बस निकट जानकर कलुआ को 
हलक़ में प्राण बसा बैठा!

हक़लाकर बोला, भाई सुन!
हल्दी में अब चंदन के गुण 
मैं तो बैठा था अलग-थलग 
अब क्या पीसेगा, गेहूँ में घुन! 

मैं तो बेचारा, कविवर ही था 
मंचों पर मारा जोकर था 
उसने दिखलाये स्वप्न बड़े 
रख, ज्ञानपीठ का दम्भ भरे!

उसने बोला, तू अकेला है 
कुछ बोले, कवि झमेला है
बिन टोली ख़ाली, कुछ भी नहीं 
दुनिया भीड़ का मेला है!

एकांकी मंच पर कुछ भी नहीं 
लेख़क स्वतंत्र तू आयेगा 
कर शोर-सुपारिश अतिआवश्यक
वाणी आकाश की पायेगा!

मैं ख़ाली लालच में आया 
रुतबे का मद नज़र छाया 
बस वार्षिक शुल्क ज़मा कर दी 
टोली की चोली सिलवाया!

अब जाता हूँ कवि-मंचों पर 
साहित्यसमाज के ख़र्चों पर 
अब लंबी पूँछ, बड़ी अपनी 
साहित्यलेखनी कंधों पर!

बोला, उसने जो बुलवाया 
शुभ साँझ-सवेरे मंचों से 
ज्ञात मुझे साहित्य नहीं 
बस राजनीति है धंधों से!

कहता हूँ मुझको माफ़ करो 
सब किया-कराया साफ़ करो!
सरपट दौड़ा मैं जाऊँगा 
उस कुनबे में छिप जाऊँगा 
उस धागे वाली 'रिमझिम' को 
दिन में फिर चार घुमाऊँगा!

सुन विनती कवि की दौड़े कक्का 
जो मन से थे हक्का-बक्का 
बोले कलुआ, अब जाने दे!
चल छोड़ छड़ी, पछताने दे!

तू कवि है केवल, भान रहे 
लेख़क की सुचिता, मान रहे 
कवि के पथ का तू गौरव है 
साहित्य में बाक़ी जान रहे!

ख़ुद को ऊँचा कर, मंच नहीं 
बस रच साहित्य, प्रपंच नहीं 
मानस का तू राजहंस 
रख मानवता अवशेष नहीं!

सुन गीता का, वह सार-शब्द 
कलुआ लज्जित-सा बार-बार 
जोड़ा कर अपने कक्का के 
था पश्चाताप से तार-तार!

मिल गृह-प्रस्थान किये दोनों 
विकल्प-रहित, संकल्प-सहित 
साहित्य प्रेम से चलता है 
हो द्वेष-रहित, कर्तव्य-सहित!


'एकलव्य'             
                            
             

      

           

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

बाट ( बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियाँ )


   बाट 
( बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियाँ )
"एक 'दर्पण' के टूटे हुए अनेक टुकड़े, जिनको मैं जितने भी शब्द दूँ, संभवतः पर्याप्त नहीं!"     


सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलाई। 
वो निर्लज्ज, परदेश बलमुआ
रात-खाट कुम्हलायी।  

चकिया भर-भर दाना पीसूँ 
डाले पिया खटाई। 
साँझ-सवेरे रोऊँ भर-भर,
अखियाँ नींद न आयी।  

सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलायी।  

ना चिट्ठी, कोई पाती आयी 
शोक पिया संदेशा लायी । 
घोरि-घोरि अब बीतन रतिया 
मोहे समझ न आयी । 

अंत समय निज आवन लागी 
टूटी खाट बिछायी । 
बंद हो रही अँखियन मोरी 
कैसी लगन लगायी । 

सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलायी ।



चितवन कैसी, रात चितेरे
मन जोगी संग लागा।
भींगा-भींगा हृदय भी प्यासा
दिन अति लागे माया।

  मुरगी पकड़ूँ कर से अपने
दौड़-दौड़कर द्वारे,
मेदिनी फिर-फिर झाड़ लगाऊँ
आ बैठूँ चौबारे।

साँझ भये घर दीपक धारूँ
निज फूँकू मुँह चूल्हा
खाँसत-खाँसत हारूँ मन से
चूल्हा बना है दूल्हा।

इस दूल्हे से प्रीत भई है
मेरी जतन बड़ाई,
स्नेह करूँ अति मन से कैसे
अंचिया धरूँ कढ़ाई।

कुलटा कैसी किसमत पायी
उनकी बनी लुगाई
दिन-प्रतिदिन हैं ऐसे बीते
जीवन बना खटाई ।

आज चढ़ रही, बसियन की सीढ़ियाँ
घर कैसे बिसराई
कोई नहीं है रोने वाला
प्रियतम करे विदाई।

↔ 
  
मुनुआ-चुनुआ 
तात-पति सब 
बैठे हैं चौबारे,
मैं कलमुई चूल्हा फूँकू 
उर-बिच बहत पनारे। 

श्वान, गऊ घर बरधा नाचे 
चीख़-चीख़  बौराये,
नाद-नाद मैं भूँसा बोरूँ 
सास भोर चिल्लाये। 

दाना डालूँ, पानी लाऊँ 
बकरी घास खिलाऊँ,
गुड़गुड़-गुड़गुड़ हुक़्क़ा बोले 
सुन-सुन आध लजाऊँ। 

बारि-बारि मैं तोपन लागूँ 
घूँघट के चौपाई,
मर्द जने, मुए ताकन लागे 
घूँघट तन पर जाई। 

देख-देख मोहे साजन जलते,
कहते ओ हरजाई !
काहे ओ, निर्लज्ज खड़ी थी
बिन तोपन परछाईं। 

भावावेश में, मैं भी कह दूँ 
तोहे लाज न आयी  
खुद सोये हो चादर ताने 
मेहर पीर पराई। 

जस मुँह खोलूँ, पीटन जाऊँ 
वही मुंगर से सवतिया 
मैं निर्लज्ज बल, गिरूँ ओसारे 
रोऊँ भर-भर रतियाँ। 

कोसूँ मुँहभर तात तनिक को 
काहे जिद भिजवाया 
बाँध खूँट के, ऐसा जनावर 
अपना पगहा छुड़ाया। 

↔       



मड़ई हमरे लूह चलत हैं 
बुढ़वा खाँसत हारी, 
देखन पीड़ा, दरद सजनवा 
चिन्ता हमहु मारी। 

खेल गदेलन, खेल-खेलके
क्षुधा-छोर नियराए, 
माई-माई, लिपट-लिपटकर 
गुड़ से रोटिया खाये। 

कलही का, मैं दूँगी इनको 
झोपड़ डिब्बा खाली, 
एक तरफ हैं साजन पसरे 
कछु कहते हैं नाही।

वैद बुलाऊँ कैसे घर में 
जेवर साहू खाया,
अब तो माटी धूरी उड़त है 
सूखा खेत गँवाया। 

लाज-शरम बस बाक़ी हमरी 
बस धन यही बचाया, 
ठकुरा हमको देख-देखकर 
गली-गली पगलाया। 

आधी राति को बुढ़वा दौड़ा 
कहता, समय है आया,
भोर भई, मैं खींचूँ शव को 
मरघट पास न आया। 

जंगल-जंगल तोरूँ लकड़ी 
मुरदा पिया जलाऊँ,
रोक-रोककर, बालक मन को 
उल्लू ख़ूब बनाऊँ। 

रात भई, अब अँधियारे में 
दीया नहीं जलाऊँ,
खाऊँ किरिया, सौ-सौ उनकी 
कुएँ ख़ूब नहाऊँ। 

ढाँढस बाँधू बचवन के मैं 
हरदी-नमक ऊबालुँ,
उबला-उबला भात,नमक-संग 
उनको ख़ूब खिलाऊँ। 

भोर भई, खेतन में जोतूँ 
खुद को बैल बनाए, 
बैलन घूरे, हमको देखें 
रगड़-रगड़ बौराए। 

सूर्य देवता दया न खाएं 
अगनी-सा बरसायें, 
बिन पानी मैं गिरी खेताड़ी 
मुँह में धूरि लगाये। 

↔    
                   
 कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 
संग परदेसी नाता जोरा 
भोर-बिसव अब मैना गाये 
कूकट जाग गये अब थोरा। 


कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

शुरु हो रहा, दिन हो जैसे 
डाले चकिया दाना वैसे 
लरिका खेल रहे हैं चारों 
कहते-कहते लाल हैं तोरा। 

 कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

बुढ़िया कहती, राशन ला रे!
घर में हैं परधान पधारे,
बाँध जनेऊ तोंद पे अपने 
कहते हैं भगवान दुआरे। 

लोटा ले रे! पानी ला रे!
कहते भगवन थोरा-थोरा,

  कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

दौड़-भाग रे! पाती आई 
डकिया बाबू पास बुलाई, 
पढ़ दे पतिया बाबू मोरी 
धड़के जियरा, थोड़ा मोरा 

कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

बाबू पढ़ रहे पाती मोरी 
कह परनाम जो इच्छा तोरी,
सूचित करत हैं मोरी बिंदिया 
घटना सही है तोरी किरिया। 

कहते-कहते बाबू अटके 
पाती फार, धरती पर पटके 
कहते बिंदिया, दुःखद ख़बर है 
तेरा नाही गुज़र-बसर है 
आगे पात न पढ़ पाऊँगा 
दुख के गीत न मैं गाऊँगा। 

इतना कहकर मौन भये 
डकिया बाबू बेचैन हुए। 

कह दो बाबू जो कहना है 
तोड़ूँ चूड़ी क्या जो पहना है!

मैं वीर सपूत की नारी 
सुख-दुःख ना अब हमपर भारी 
लड़ते हैं सीमा पर सजना 
आगि लगी काहे मोरे अँगना!
गोली खायें वे ढेंगलायें 
मारि-मारि मैं जाऊँ संगना!

मृत तो हुई उसी दिन मैं न
रिश्ता जोरा उनसे रैना 
चिता फूँक रही देर-सवेरे 
चिंतामुक्त हुई हूँ मैं न!

'एकलव्य' 
बाट = प्रतीक्षा 
   "साहित्य एक क्रांति है न कि मनोरंजन का केवल एक माध्यम"  
           

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

वैश्या कहीं की ! ( लघुकथा )

                                         



 वैश्या कहीं की !  ( लघुकथा )


"अरि ओ पहुनिया!"
""करम जली कहीं की!"
"कहाँ मर गई ?"
"पहिले खसम खा गई!"
"अब का हम सबको खायेगी!"
"भतार सीमा पर जान गँवा बैठा, न जाने कउने देश की खातिर!"
"अउरे छोड़ गया ई बवाल हम पर!"
कहती हुई रामबटोही देवी अपनी बहुरिया पहुनिया को दरवाज़े पर बैठे-बैठे चिल्लाती है। 

"का है ?" 
"काहे सुबहे-सुबहे जीना हराम करे पड़ी हो ?"
"चूल्हा जलाती होगी बेचारी!"
"तुमसे तो कउनो काम होता नहीं!"
"अउरे जो कर रहा है, उसका भी करना मुहाल करे रहती हो!"
अपना चिलम फूँकते हुए छगन महतो अपनी अधेड़ स्त्री को दो टूक सुनाते हैं। 

"हाय-हाय!"
"ई बुढ़वा को सभई दोष हमरे ही किरिया-चरित्तर में दिखता है!"
"अपने बहुरिया की छलकती हुई जवानी में कउनो खोट नाही दिखाई देता तुमका!"
"अरे आजकल ऊ झमना लोहार के लड़िकवा दिन-रात इहे दरवज्जे पर पड़ा रहत है!"
"और तो और, ई छम्मक-छल्लो ओकरी आवाज़ सुनकर दरवज्जे पर बिना घूँघट के मडराने लगती हैं!"
"वैश्या कहीं की!"      
बकबकाती हुई रामबटोही दरवाज़े पर खड़े बैलों को चारा खिलाने लगती है। तभी अचानक एक करुणभरी चीख़ दरवाज़े से होते हुए ओसार तक पहुँचती है। छगन महतो चीख़ सुनकर अपना चिलम छोड़, दौड़े-दौड़े दरवाज़े की तरफ़ आते हैं जहाँ बैलों ने रामबटोही को ज़मीन पर पटक दिया था, और वो बदहवास छितराई पड़ी थी।

"अरे ओ पहुनिया!"
"तनिक दौड़ जल्दी!"
"देख, तुम्हरी सास को बैल ने पटक दिया!" कहते हुए छगन महतो मंद-मंद मुस्कराते हुए ओसार में जाकर अपना चिलम फूँकने लगते हैं और अपना मुँह ओसार की छत की ओर कर धुँआ निकालते हुए मानो जैसे कह रहे हों "शठे शाठ्यम समाचरेत!"


           

लेखक: ध्रुव सिंह 'एकलव्य'   

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

''अर्जुन सागर' नवोदय सम्मान"




 ''अर्जुन सागर' नवोदय सम्मान" 



नवोदय साहित्यिक एंव सांस्कृतिक मंच, साउथ सिटी, लखनऊ ने आज 22-12-2019 को, गुलमोहर ग्रीन स्कूल, ओमैक्स सिटी, शहीद पद, रायबरेली, लखनऊ के आडीटोरियम में, आचार्य ओम नीरव की अध्यक्षता में *नवोदित* कवियों को "राम कुमार सरोज 'अर्जुन सागर' सम्मान" से कु आयुषी पाल,ध्रुव सिंह 'एकलव्य', प्रान्जुल अष्ठाना, संजीत सिंह 'यश', कु सौम्य मिश्र 'अनुश्री', अरुण कुमार वशिष्ठ, सुरेश कुमार राजवंशी, संदीप अनुरागी, श्रीमती पायल भारती, अम्बरीष मिश्र, संजय समर्थ एवंम कु श्वेता को सम्मानित किया गया। आज के समारोह के मुख्य अतिथि सरवर लखनवी, नवोदय उपाध्यक्ष कृपा शंकर श्रीवास्तव विशिष्ठ अतिथि ओम प्रकाश 'नदीम' एंव मन मोहन भाटिया'दर्द'। मंच संचालन श्री शिव मंगल सिंह 'मंगल' द्वारा किया गया। सरस्वती वंदना ....द्वारा, धन्यवाद प्रस्ताव महेश अष्ठाना 'प्रकाश' द्वारा।

सम्माननित नवोदित कु आयुषी पाल,ध्रुव सिंह 'एकलव्य', प्रान्जुल अष्ठाना, संजीत सिंह 'यश', कु सौम्य मिश्र 'अनुश्री', अरुण कुमार वशिष्ठ, सुरेश कुमार राजवंशी, संदीप अनुरागी, श्रीमती पायल भारती, अम्बरीष मिश्र, संजय समर्थ एवंम कु श्वेता,व अन्य वरिष्ठ कवि ओम नीरव, कृपा शंकर श्रीवास्तव'विश्वास, 'सरवर लखनवी, ओम प्रकाश नदीम, शिव मंगल सिंह'मंगल', प्रेम शंकर शास्त्री 'बेताब', सच्चिदानंद शास्त्री, मन मोहन भाटिया 'दर्द', डा. करुणा लता सिंह, विभा प्रकाश, महेश अष्ठाना'प्रकाश', बेअदब लखनवी, पूर्णिमा बर्मन,.श्री कांत तैलंग, निशा सिंह, सुभाष चन्दर् रसिया, सम्पत्ति कुमार मिश्र 'वैसवारी' व आदित्य सरन द्वारा विशेष कविता-पाठ किया गया। कार्यक्रम का छायांकन एंव वीडियोग्राफी आदित्य सरन द्वारा की गई।
काव्यपाठ के उपरांत संस्था के महासचिव महेश अष्ठाना 'प्रकाश' ने सभी का आभार व्यक्त किया।

''अर्जुन सागर' नवोदय सम्मान" 

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

नारी सशक्तिकरण! ( लघुकथा )





नारी सशक्तिकरण! ( लघुकथा )


"रामकली!
"अरी ओ रामकली!"
"पकौड़े ला रही है या बना रही है!"
"ये निठल्ली मुई, एक काम भी समय से नहीं करती है!"
कहती हुई भावना अपनी नौकरानी रामकली पर खीझती है।

"छोड़ यार!"
"इधर मन लगा!"
"देख तू फिर से हार जायेगी!"
"नहीं तो!"
"चल, अपने ताश के पत्ते संभाल!"
कहती हुई भावना की सहेली शिखा ताश के पत्तों को बड़ी ही दक्षता से एक माहिर खिलाड़ी की तरह बाँटती है।

"मेरी अगली चाल सौ की!"
कहते हुए भावना सौ रुपये का नोट टेबल पर पड़े ताश के पत्तों पर दनाक से फेंक देती है।

"क्या यार, कर दी न छोटी बात!"
"अरे, इतने बड़े अफ़सर की बीबी है और तो और नारी सशक्तिकरण मंच की अध्यक्षा भी!"
"और टेबल पर बस सौ रुपये!"
"थोड़ा बड़ा दाँव लगा!"
कहती हुई भावना की सहेली पुष्पा अपने जूड़े को अपने हाथों से समेटने लगती है।

चाय की चुस्की लेते हुए शिखा,
"अरे यार, ये बता!"
"हमारी नारी सशक्तिकरण मंच वाली पार्टी कहाँ तक पहुँची ?"
तिरछी नज़रों से देखते हुए भावना की ओर प्रश्न दागती है।

"कह तो दिया है इनसे कि मल्होत्रा जी का रॉयल पैलेस देख लें और बुक कर दें, अगले रविवार के लिये!"
गहरी साँस लेते हुए भावना उसे तसल्ली देती है।

"अरे, मंच के लिये कोई धाँसू कविता तैयार की है कि नहीं ?"
"पिछली दफा तेरी वो भूखे-नंगों वाली कविता ने तो पूरे महफ़िल में कोहराम मचा दिया था!"
"और वो रेप वाली लघुकथा, उसने तो सबकी आँखों में आँसू ही ला दिये थे!"
शिखा, भावना को दो फुट चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए नमक़ीन के कुछ दाने अपनी मुठ्ठी में भर लेती है। तभी रामकली पकौड़ों का प्लेट लेकर रसोईं से टेबल की ओर बढ़ती है।

"अब क्या होंगे तेरे ये पकौड़े ?"
"हमारी चाय तो कब की ठंडी हो गयी!"
"तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता!"
"चल जा यहाँ से!"
भावना उसे खरी-खोटी सुनाते हुए जाने के लिये कहती है। परन्तु न जाने क्या सोचकर रामकली वहीं उसी टेबल के पास कुछ देर तक बुत बनी खड़ी रहती है।

"अब क्या है?"
"प्लेट रख, और जा यहाँ से!"
"क्यों खड़ी है मेरे सर पे ?"
सर पर हाथ रखते हुए भावना उसे फटकारती है।

"मालकिन, मेरे पोते का मुंडन है आज!"
"सौ रुपये मिल जाते तो!"
संकोच करते हुए रामकली कहती है।

"पैसे क्या तेरे बाप के घर से लाऊँ!"
"अगले महीने दूँगी!"
"काम करना है तो कर!"
"नहीं तो अपना हिसाब कर, और चलती बन!"
कहती हुई भावना, ग़ुस्से से उसे घूरती है। रामकली निरुत्तर-सी कुछ देर वहीं खड़ी रहती है और फिर अपना सर झुकाये वहाँ से चली जाती है।


लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'            
              

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

वे कह गये थे अक़्स से... ( 'नवगीत' )




वे कह गये थे अक़्स से...'नवगीत' )

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
मैं जा रहा हूँ, वक़्त से
नज़रे मिलाना तुम !

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
ख़ाक में, हूँ मिल गया 
ज़र्रा हुआ माटी, 
मेहनतों के बीज से  
फसलें उगाना तुम !

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

बह गई है शाम 
फिर अब न आयेगी, 
चिलचिलाती धूप में 
दीपक जलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

हो नहीं सकता ये रिश्ता 
बादलों से नेक,
कुएँ की नालियों से पेटभर 
पानी पिलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!


दीवारें हिल नहीं सकती हैं,  
काग़ज़ के पुलिंदों से  
सितमग़र वे रहेंगे बाग़ में 
मरहम लगाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!


नृत्य करता मोर है 
कहते रहेंगे वो,
काम है उनका, 
हमेशा का यही हर-रोज़
      सर बाँधकर पैग़ाम यह,      
सबको बताना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

सरताज़ हैं, सरकार हैं 
हर ताज़ पर काबिज़,
हर रोज़ ढलती शामों की 
क़ीमत चुकाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
बोतलों को मुँह में भर 
जो लिख रहे कविता, 
फूस की रोटी जली 
उनको खिलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!

'जयशंकरों' की भीड़ में ग़ुम 
सत्य का साहित्य
'प्रेम' का साहित्य है
उनको बताना तुम! 

वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
मैं जा रहा हूँ, वक़्त से
नज़रे मिलाना तुम !

'एकलव्य'

( मेरा यह 'नवगीत' कथासम्राट आदरणीय मुंशी प्रेमचंद जी को समर्पित है। )   

  

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

एन.आर.सी है कि बवाल ! (लघुकथा)



 एन.आर.सी है कि बवाल ! (लघुकथा) 


रामखेलावन, पैर पटकता हुआ अपने फूस की मड़ई में प्रवेश करता है और पागलों की तरह घर के कोने में पड़े जंग लगे संदूक को खोलकर जल्दी-जल्दी उसमें पड़े कपड़ों और पुराने सामानों को इधर-उधर मिट्टी के फ़र्श पर फेंकते हुए चींख़ता है,

"अरे ओ नटिया की अम्मा!"
"मर गई का!"
"कहाँ है ?"
"ज़ल्दी इधर आ!"

फूलन देवी अपनी साड़ी के पल्लू को संभालती हुई रसोईं से अपने पति रामखेलावन की ओर दौड़ती हुई,

"का हुआ ?"
"काहे आसमान फाड़ रहे हो!"
"अउर ई का!"
"ई का कर रहे हो ?"       
"भाँग-वाँग खा लिये हो का!"   
"सारा सामान ज़मीन पर काहे फेंक रहे हो ?"
"का चाहिये तोका ?"
"हमसे कहते, हम निकाल देते।"
फूलन, रामखेलावन पर चिल्लाती हुई अपनी साड़ी के पल्लू को आटे लगे हाथों से ठीक करती है,
"का हुआ ?"
"इतना काहे सुरियाये हो!"

"अरे गज़ब हो गवा!"
"ऊ ससुरा एन.आर.सी आवे वाला है!"
कहता हुआ रामखेलावन अपने कंधे पर रखे मैले गमछे से अपने माथे का पसीना पौंछता है।
"अरे आज मुखिया जी पंचायत बुलाये रहे।"
"वे कह रहे थे कि एन.आर.सी ससुर आ धमका है!"
"सबही गाँव वाले अपना-अपना पहचान-पत्र और कउनो ज़मीन के काग़ज़ तैयार रखें!"
"नाही तो गाँव से उसका हुक़्क़ा-पानी सबही बंद कर दिया जायेगा और गाँव से बाहर निकाल दिया जायेगा!"

"अरे, कइसे निकाल देंगे हमको!"
"हमरे बाप-दादा यहीं रहे हमेशा और हमें कइसे निकाल देंगे!"
"का कउनो हलुआ है का!"
"अउर सभही का यही रहेंगे ?"
कहती हुई फूलन अपना विरोध दर्ज़ कराती है।

मुखिया जी कह रहे थे कि-
"केवल ज़मींदार साहेब!"
"लाला जी!"
"अउरो ऊ पुरोहित जी!"
"ई गाँव में रहेंगे!"
कहते हुए रामखेलावन पश्चातापभरी आँखों से फूलन को देखता रहा।

"अरे, ई का!"
"काहे ऊ काहे रहेंगे ?"
"उनही के बाप-दादा खाली चमेली का तेल अपने उजड़े चमन में लगाये रहे का जो सारे गाँव में अब तक महक रहा है!"
रामखेलावन फूलन को समझाता हुआ-
"अरे नाही!"
"ई बात नहीं है!"
"असल में उनके बाप-दादा पढ़े-लिखे रहे, सो उनके पूरे ख़ानदान का नाम गाँव के पंचायत-भवन के रजिस्टर में मौज़ूद रहा!"

"हम सब ठहरे अँगूठा-टेक!"
 "अउर का!"

"तो का मतबल!"
"हमार नटिया भी गाँव में न रहेगी!"
फूलन के इस मासूम से सवाल पर रामखेलावन सजल आँखों से उसे एक टक देखता रह गया!