आपका स्वागत है।

मंगलवार, 4 जून 2019



गरिमा ...  


मूल रचनाकार : ध्रुव सिंह 'एकलव्य' 
                                                               ध्वनि : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'
            विशेष सूचना : प्रस्तुत रचना के सभी अंश, लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। 


रविवार, 2 जून 2019

बोल दूँ ! हिम्मत नहीं गृहस्वामिनी !


बोल दूँ ! हिम्मत नहीं गृहस्वामिनी !



खाने-पीने वालों का दौर है..., अब दौर साहेब !
भूखे-नंगों की गुहारें, अब सुनता है कौन... !

वे 'रेस्तरां' में बैठकर , लिखते हैं ''सोज़े वतन''
नरकट की स्याही से, अब दर्द चुनता, है वो कौन.... !  

लिखना भी क्या मेरा था ! लिखते थे क्या वो ! डि.लिट. वाले,
छप भी गए तो, क्या उखाड़ लेंगे ! ब्याज़ पर दर ब्याज़ खेतों के, चुकाएगा कौन... ! 

खाने-पीने वालों का दौर है..., अब दौर साहेब !
भूखे-नंगों की गुहारें, अब सुनता है कौन... !

नीम उनका, ज़मीन भी है उनकी 
शतरंज़ की हर शह भी क्या, हर मात उनकी 
ठहरे हम तो सोनेवाले, उस नीम पे... 
रातभर इस शर्द में, चिल्लाएगा कौन !

खाने-पीने वालों का दौर है..., अब दौर साहेब !
भूखे-नंगों की गुहारें, अब सुनता है कौन... !

कहते-कहते सेवक तुम्हारा, बन गए अब स्वयंसेवक 
लग गए कुकर्मों के पुलिंदे गलियों में , भिश्ती बनकर बेशर्म-सा उठायेगा कौन...!

आजकल फ़ुर्सत नहीं है देख लूँ ! फ़िज़ा-ए-तस्वीरें वतन 
पीढ़ियों की रात, अब व्हाट्सप पर टँगी हैं 
सड़कों पे अब सोज़े वतन, चिल्लाएगा कौन...!

 खाने-पीने वालों का दौर है..., अब दौर साहेब !
भूखे-नंगों की गुहारें, अब सुनता है कौन... !

बोल दूँ ! हिम्मत नहीं गृहस्वामिनी ! अब ख़ून में,
मौन नेत्रों से सही, वह पूछती है ! चूड़ियाँ हैं मेज़ पर, खनकायेगा कौन...!  

 खाने-पीने वालों का दौर है..., अब दौर साहेब !
भूखे-नंगों की गुहारें, अब सुनता है कौन... !
    

'एकलव्य' 
    
         
     

शुक्रवार, 10 मई 2019

आपसभी प्रतिभाशाली रचनाकारों से पत्रिका के आगामी अंक हेतु आपकी मौलिक रचनाएं आमंत्रित करती है।



आवश्यक सूचना :

सभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों को सूचित करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि अक्षय गौरव ई -पत्रिका जनवरी -मार्च अंक का प्रकाशन हो चुका है। कृपया पत्रिका को डाउनलोड करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर जायें और अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाने हेतु लिंक शेयर करें  ! सादर      
  https://www.akshayagaurav.in/2019/05/january-march-2019.html
ई-पत्रिका "अक्षय गौरव" आप सभी रचनाकारों एवं सुधि पाठकों का साहित्य सृजन के अभिनव प्रयोग एवं आयोजन में स्वागत करती है एवं आपसभी प्रतिभाशाली रचनाकारों से पत्रिका के आगामी अंक हेतु आपकी मौलिक रचनाएं आमंत्रित करती है।
"अक्षय गौरव" त्रैमासिक ई-पत्रिका में रचना प्रेषित करने एवं प्रकाशन सम्बन्धी नियम व शर्तें-
1. प्रेषित की गयी रचना पूर्णतः मौलिक, अप्रकाशित एवं अप्रसारित होनी चाहिए अन्यथा रचना पर कोई विचार नहीं किया जाएगा। इस बाबत रचना के साथ घोषणा-पत्र संलग्न करें। (घोषणा-पत्र इस प्रकार होगा- "मैं यह घोषणा करता / करती हूँ कि प्रस्तुत रचना स्वरचित, निताँत मौलिक, अप्रकाशित एवं अप्रसारित है।" अंत में रचनाकार का पूरा नाम व पता (शहर व प्रदेश का नाम ) छायाचित्र के साथ संलग्न करें।
2. रचना में मात्रा एवं टंकण की अशुद्धियाँ यथासंभव नहीं होनी चाहिए।
3. एक अंक हेतु केवल एक ही रचना हिंदी साहित्य की किसी भी विधा में प्रेषित की जानी चाहिए।
4. रचनाओं के चयन में अंतिम निर्णय संपादक मंडल का होगा।
5. रचना के स्वीकृत होने पर रचनाकार को ई-मेल द्वारा सूचित किया जाएगा एवं रचनाएँ अस्वीकृत होने की दशा में रचनाकार से कोई पत्राचार नहीं किया जाएगा।
6. रचना केवल क्रुतिदेव 101 अथवा यूनिकोड में हो तो बेहतर होगा।
7. रचना प्रकाशित करने के लिये न ही कोई शुल्क लिया अथवा दिया जाएगा। यह पूर्णतः हिंदी साहित्य के सम्वर्धन हेतु प्रारम्भ की गयी अव्यवसायिक पत्रिका है।
8. रचना में विवादित सामग्री अथवा किसी भी धर्म,सम्प्रदाय,नश्ल,जाति एवं धार्मिक-सामाजिक विशिष्ट पहचान सूचक सम्बन्धी शब्दों का प्रयोग न करें और यदि रचनाकार फिर भी इन बातों को नजरअंदाज करते हुए ऐसी रचनाओं का सृजन करता है और रचना प्रकाशित हो जाती है तो सम्पूर्ण जवाबदेही उक्त रचनाकार की ही होगी न कि सम्पादक व प्रकाशक की।
9. हिंदी साहित्य की सभी विधाओं की रचनाएँ नीचे दिए गये ई-मेल पर प्रेषित करें-
editor.akshayagaurav@gmail.com
10. प्रेषित रचना में किसी भी लिंक का उल्लेख न करें।
11. रचनाएँ प्रेषित करने की अंतिम तिथि : 10 जून 2019 तक रचनाएँ हमें प्रेषित की जा सकती हैं। निर्धारित समय के पश्चात प्राप्त रचनाओं पर कोई विचार नहीं किया जाएगा।

                                                                https://www.akshayagaurav.in/2019/05/january-march-2019.html

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

RISING AUTHOR AWARD 2019




आप सभी गणमान्य पाठकों एवं मित्रों को सूचित करते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि इस वर्ष अक्षय गौरव पत्रिका के RISING AUTHOR AWARD 2019 का ख़िताब मुझे दिया गया है। आप सबके सहयोग हेतु धन्यवाद ! सादर 
'एकलव्य' 


सोमवार, 7 जनवरी 2019

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार: हिंदी साहित्य की ऑनलाइन पत्रिका hindi literature online magazine



लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन २०१९ में मेरी तीन लघुकथाएं :
१. मटमैला पानी, 
.''गिरगिट''
३. नौटंकी, 
दिए गए लिंक पर जाकर पढ़ें !  सादर 
                                                 
                                                           'एकलव्य' 





रविवार, 30 दिसंबर 2018

छद्दम वर्ष....



ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

बीत गईं, अब साँझ नई
लेकर आई है राग वही
बन नवल रात्रि में स्वप्न नये
कल नया सवेरा लाता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

वर्षों बीते,सदियाँ बीतीं
गंदले इतिहास के पन्नों में
कुछ जीर्ण-शीर्ण, कुछ हरे-भरे
उन जख़्मों को सहलाता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

प्रण धुँधला है और संशय भी
दृग-विहल अश्रु-सा कल-कल भी
तारीख़ें फिर-फिर आयेंगी
बनकर स्मृतियों-सा अनल समीर

मैं सूतपुत्र हूँ, कर्ण सही
कर्तव्य-अश्व  दौड़ाता हूँ।

नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

राजा ना हूँ मैं, प्रजा सही
कीचड़, मस्तक-तन सना सही
हल हाथों, न कोई खंज़र है
भूखी जनता हर घर-घर है
स्वप्न नये हैं , पौध यही
क्यारी-क्यारी बिखराता हूँ।

नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

अब दूर नहीं आशा अपनी
हर बोली है , भाषा अपनी
मैं भारत हूँ , न धर्म कोई
हों द्वेषविहीन, न मर्म कोई
हो नये वर्ष का धर्म यही
हाथों में तिरंगा ले-लेकर
बन नया वर्ष फहराता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ... 
नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...      

'एकलव्य' 

  ( प्रकाशित :  अंक 53, जनवरी(द्वितीय), 2019 साहित्यसुधा  )





शनिवार, 15 दिसंबर 2018

आभासी क्षितिज

( वर्तमान समय में पति-पत्नी के रिश्तों में शून्य होता प्रेम ! )



म थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

स्नेह नया,वह साँझ नई
उर आह्लादित उम्मीदों को
कर बाँधा था उसके कर से
मन विलग रहा, पर-सा मन को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

तैरा करते थे स्वप्न बहुत
कुछ मेरे लिए ,थोड़ा उनको
जीवन चलता,चरखा-चरखा
डोरी कच्ची है कातने को
मैं मानता ! गलती मेरी थी
स्नेह अधिक था पाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

था क्षितिज, जो नभ में दौड़ रहा
हम दौड़ रहे अपनाने को
सौगंध थी जीने-मरने की
जीवित हैं केवल जीने को
मरने तो लगे दोनों प्रतिक्षण
मैं 'मैं' हूँ, केवल मैं ही रहूँ
'पर' से जग में दिखलाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

स्मरण बहुत ही आते हैं !
जब हम थे,'मैं' का गमन रहा
ज्वर में मैं दर्द से ग्रसित रहा
बन ताप-सा तुझको आता था
गीली पट्टी और लेप लिए
माथा तेरा सहलाता था
घर के कोने अब लस्त पड़ा !
अश्रु कहते हैं आने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

चिट्ठी-पाती से भिजवाया 
तूने कहकर ,तू अलग रहे 
तब जोड़े थे उस अग्नि से 
यह रिश्ता अपना अलख रहे 
क्या भूल थी यह हम दोनों की !
कुछ मीठे सपने पाने को 

क्यूँ थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...?

वो पल थे, जब तुम होती थी
बनकर जीवन की आशा-सी
रंगों को भरती सपनों में
नभ 'इंद्रधनुषी' काया-सी
ये पल है, जब तुम 'काज' बनी
मेरी बदरंगी दुनिया की !
दुनियावाले बस कहते हैं
रिश्तों का नाम, निभाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

र्शकदीर्घा ने खींच दिया
ड्योढ़ी हुई सीमा अपनी
रिश्ते हैं, काँच-से टूट गए
कुछ शेष नहीं बतलाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

हते-कहते,अब 'मैं' ही हूँ
जीवन रस्ते ,विपरीत बनें
अब चलने को एकांत हमें   
भस्म हुए रिश्ते सारे 
बैठा 'मरघट' पछताने को 

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

'एकलव्य'