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गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

बैरी पाती



शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

स्वप्नचंद्रिका मिलने आई
प्रियवर तुमसे प्रीत लगाई
निशा पहर अब बीते दुख-सा
ग्रीष्म ऋतु बरसात बुलाई
स्मरण करूँ क्षण,नेत्र ही नम हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

गए पिया परदेस कमाई
एक युग बीता,पात न आई
संशय होता भूल गए तुम
गाँव बहे ठंडी पुरवाई
तन लागे, कंटक अनुभव हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

रोज निहारूँ डकिया बाबू
पूछूँ साहेब चिट्ठी आई
आस करूँ, वे कह दें हमसे
खाट बिछा ! मैं पानी लाई
कहते कह दूँ , पढ़ दो पाती !
प्रीत घुले मन ,तन शीतल हो

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

गाँव फसल अब दावन लागे 
मैं भी भर-भर भूसा लाई 
पर 'परजा' के फसल कट गए 
मेहनत मेरी 'गोरुअन' खाई 
साँझ चूल्हे मैं आग लगाऊँ, क्षुधा शांत और गुजर-बसर हो। 

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

बेर-बिसव चढ़ सूरज आया
दरवाजे कोहराम मचाया
लुकती-फिरती मड़ई में आई
पोंछ-पोंछ तन खूब नहाई
कहते चाचा,ओ री 'झमली' ! दौड़ी आ रे ! पाती आई
पढ़ दे बबुआ ! पाती मेरी, ठहर-ठहर मैं दौड़ी आई !
अनजाने तू कह दे मुझसे,वो आ रहे,स्वप्न सफल हो।

 शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

अब अधीर, अब और न पगली
धीरज धर ! ओ जल की मछली !
खोलन दे ! पतिया तो मुझको
बिन पढ़के क्या कह दूँ तुझको !
भाव मैं जानूँ मुखमंडल के,युग-युग का अवसाद महल हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

पढ़ते-पढ़ते हाथ से छूटा
'पात',पात से गिरकर टूटा
वाचन-वाचन रुध आया था
गला भाव से,आँख में फूटा
क्या कह दूँ ? ओ 'झमली' बता तू !
नाव बह रही ,पतवार गया डूब।
अब तू कहेगी मैं हूँ झूठा ,मुझ अनपढ़ को तुमने लूटा।

फिर भी कहूँगा,भूल जा उसको
'स्वर्ग' गमन में रूठ गया वो
शेष नहीं दुनिया में कोई
सात फेरों का किरिया-मंतर ,
क्षणभर में 'कुल' तोड़ गया जो
रो दे पगली ! भर-भर अंखियाँ ,तन पाषाण न बोझिल मन हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो.........

कैसे भूलूँ ? डकिया बाबू !
रोते-रोते रात न सोई
दिन ढलता था,बाट में उसकी
स्मरण करूँ तब भर-भर रोई।

डूबूँ या उतराऊँ सागर
फरक पड़े क्या 'ढाई'-आखर
पाती-पाती ना कोई नाता
ना बाबू ! अब तुम न आना !
चिल्लाना न ! पाती आई
गाँव-गाँव चुपके से जाना
बिन बैरी अब मड़ई सूनी ,तन जीवित मन ,मृतप्राय सकल हो।

शांत वेदना,अकलुषित मन हो,मिलकर प्रियतम रात सजल हो......... 


'एकलव्य' : प्रकाशित रचना 'साहित्यसुधा' वर्ष: 3, अंक 48, नवम्बर (प्रथम) , 2018 )

 
पाती - चिठ्ठी 
गोरुअन - मवेशी 
परजा - गाँव के लोग 
कुल -ख़ानदान ( परिवार )
बाट - प्रतीक्षा 
मड़ई - घास-फूस का घर  

                                                                                                छायाचित्र : साभार गूगल 

रविवार, 16 सितंबर 2018

प्रकृति-'प्रीत'



चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

निशाकलश छल-छल छलके 
जब बन चकोर तू गाता है। 

 चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    

भोर जा रही परदेस पिया 
रथ-रश्मि चढ़ तू आता है 
कुएँ पर घिरनी खींच रही 
तू मंद-मंद मुस्काता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

उड़ा रही माटी को मैं 
इन गोरी-गोरी बाँहों से 
माटी बनकर सम्मुख मेरे 
नित-नयन को क्यूँ भरमाता है !

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

माता-री मेरी बुला रही 
धुँएं से चूल्हा जला रही,
वेश धरन में नटखट है 
तू खाँसत-खाँसत अटकत है 
बन 'प्राणवायु का मीत' मेरे, नलियों में घुलता जाता है.......

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    

हैं दरवज्जे कुछ 'नाद' बंधे 
बन पगहे सब साथ सजे 
क्षुधा लगी बारी-बारी 
चींखें सब आ री ! आ री ! 
चूनी-भूसी नद बोर रही 
पानी-पानी में घोर रही 
बन भूसा लिपटा माने ना !
ओ रे ! प्रियवर, तू जाने ना 
कर लाज-शरम ! सब देखत हैं 
आँखें मींचूँ, स्पर्श करे,ओ जुल्मी ! तू इठलाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

पगडण्डी पर चलती जाती 
थोड़ी गिरती और लहराती 
पीले सरसों के बौंरों से 
हँसती हूँ, तनिक लजा जाती
भरसक प्रयत्न तू करता है,कदमों में मेरे आ जाए 
बन राह में छोटे कंकड़-सा,कोमल-से हृदय समा जाए 
दृग-भ्रमित मैं क्षणभर हो जाऊँ !
नित वैरी जाप लगाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है ......... 

हल्दी,चंदन का बन उबटन 
देह लगाएं संग सखी 
मलती भर हाथों से पांव मेरे 
तू प्रीत-सा चिपका जाता है 
वस्त्र ब्याह के जुगनू-सा, टिम-टिम चमके जाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

साथ नहीं अब भी छोड़ा 
कर काँधे से मुझको जोड़ा 
उठा रहा परदेसी-सा 
और डोल रहा थोड़ा-थोड़ा 
मैं झांक रही डोली चढ़कर,नित परिचित-सी बाबुल के घर 
मन आह्लादित भी ! बन अश्क गिरे ,चंचल स्मृतियों-सा आज बहे 
नग्न पांव उठा डोली ,ओ पगला ! चलता जाता है .......

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

अब सजना से ही प्रीत भई 
चकिया में पिस-पिस रेत हुई 
जीवन अखरी-सा दाल हुआ 
कब प्रेमनगर कंगाल हुआ !

नित सास-ससुर अब डांटत हैं,मोरे सजना मोहे भांपत हैं 
मैं दासी रह गई 'पर' आँगन, खूँटे में क्षण-क्षण बाँधत हैं 
खूँटे में बंधा ओ रस्सी-सा ! मुझको तू बड़ा नचाता है।

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

है गमन कर रहा यौवन मेरा 
तू ठहरा-ठहरा देख रहा 
'प्रतिलिपि' अब दौड़ें मेरी
जीवन समीप अब खेद रहा,
जर्जर हुआ बदन मेरा,काया सर्पिल-सी डोल रही 
श्रीमुख से अब ना दर्द बहे ,मैं मन ही मन में बोल रही...... 

है कंठ सूखता,प्यास लगी 
दे-दे पानी कोई ,आस लगी 
तू शीतल-शीतल बैठा है,चुलबुल पानी के मटके-सा 
मैं तरस रहीं हूँ बूँदों को, बौरा तू रिसता जाता है .......    

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

पहले सजना 'यमदेश' गए 
अब बालक भी परदेस गए 
मैं अधमरी खाट पड़ी पगली 
चलने से मृत्यु लाख भली 

कर खिसक-खिसककर उठती हूँ ,गिरती एकांत संभलती हूँ 
ताने मारे वो प्रेमपथिक ,बन श्याम मेघ छिप जाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

अब चार टाँग की शैय्या पर
लेटी हूँ जैसे रात धवल 
दुल्हन थी कभी 
अब शव बनकर !

ढकता जाता उसी पगले से, मेरी काया लाचार हुई 
एक दिन था बचती फिरती थी,उस परदेसी के साथ चली...... 

पलभर में धूल हुआ यौवन ,कभी पल-पल जो इठलाता था 
स्वर शहनाई-सा शांत हुआ, जो 'मधुकर' बगिया गाता था 

नदिया में रेत विलीन हुआ ,क्षणभर में गहराई जाकर 
'प्रेमपथिक' आह्लादित है,मुझको खुद में खुद से पाकर 
आत्मतृप्ति की खुशियों  से ,वो लहर-लहर लहराता है 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   


'एकलव्य'                   ( प्रकाशित : वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम), 2018 साहित्यसुधा  )



अखरी = पत्थर की चकरी में पिसी दाल 
नाद = मवेशियों के खाने का बर्तन   
पगहा = मवेशियों को बांधे जाने वाली रस्सी 
   छायाचित्र : साभार गूगल      

रविवार, 19 अगस्त 2018

चलचित्र !



आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

थी धवल केश-सी चिरपरिचित 
बन भूत-सी मिटती स्याही की 
बनकर आई है,साँझ वही 
कुछ ख़्वाब नवल थे..........   

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................   

माथे हैं चिन्हित झुर्रि-सी, यौवन भूत की अंगड़ाई 
कर कोमल बीती सदियाँ थीं , पाषाण उर अवशेष बने थे 
कह दूँ प्रियतम ! कैसी हो तुम ?
संकेत बने थे ......... 

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

वह काल था सुन्दर क्षणभर 
जब तू आई थी 
मैं हारा-हारा रहता, 
तू शरमाई-सी
भागा-भागा मैं फिरता,
तू कतराई-सी  
चट्टी की चाय पे बैठा,
मनमाने दिन थे 
पीछा करता, तू भागे 
अनजाने दिन थे .........

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

डेरे डाले रहता था, मैं छत के ऊपर 
कभी श्वान-सा लेटा-लेटा, नाले पर जाकर 
बन धवल चन्द्रिका आई, 
तू बनकर उस क्षण 
पलभर में सदियाँ जी ली !
तुझे दूर से पाकर 
तुझको क्या बतलाऊँ ? ओ प्रियतम !
रात तिमिर में स्वप्न लिए 
वे कैसे दिन थे !

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................     

बाइस्कोप-सी आँखें , मंडराई फिरती 
मंद-मंद मुस्काती 
अधरों से पेंच लड़ाती 
मुँह में थी, केश चबाती 
मैं लुटा-लुटा करता था 
जलसे के दिन थे ......... 

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे................... 

मैं इधर-उधर भागा था, पुरवाई बनकर 
एक चीख़-सी गूँजी नभ में, शहनाई बनकर 
डोली उठी थी तेरी, रुसवाई बनकर
खोया-खोया मैं रहता
तन्हाई बनकर 
हृदय से फूटी धारा,
गूँगे-से पल थे.........

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे................... 

कितनी बार था झाँका ! मधुशाला मैंने 
उठता-उठता मैं गिरता, आवारापन में 
पर लाख दुआएं माँगी , इस क्रोधित मन से 
कैसे बतलाऊँ, ओ प्रियतम ! 
बड़े टेढ़े दिन थे.......... 

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे................... 

अब टिप-टिप करती बूँदें नलियों से आतीं  
फिर बारिश की वो रिमझिम, स्मरण कराती 
अंतर है ! भींगता मैं हूँ 
तू देख न पाती 
बोतल की लड़ियाँ टँगी हुईं, नित तेरे करतल 
थोड़ा जी ले ! ओ प्रियतम ! 
मैं आज बुलाता 
निज नयन से क्षणभर कह दे !
बड़े अच्छे दिन थे .........  

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................

श्वेत साज पर लेटी, तेरी मोहक काया 
नहीं आज उठाने कोई ,परदेशी आया 
व्यग्र हुआ मैं आज कि तुझको फिर थामूँगा 
कांधे पर रखूँगा कई बार तुझे 
और मैं गाऊँगा। .........

आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे 
आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................


'एकलव्य' 



रविवार, 8 जुलाई 2018

काहे बोला !

साहित्य ही है 'धर्म' !
जब उसने कहा था 
तंज की गहराइयों में 
जा फँसा था। 
लेखनी चम-चम बनी थी
प्रगति द्योत्तक !
जा रे ! जा ! बहरूपिये 
झुठला रहा था। 

बुद्धिजीवी साहित्य के थे 

वे पुलिंदे,
कोने-कोने में छुपा 
भय खा रहा था। 

रे फिरंगी ! प्रतियाँ जलाईं 

क्यों रे ! उनकी 
जग में कोलाहल मचा 
वो गा रहा था। 

भूत के वे 'भूत'

शोर करते यहाँ हैं  
सत्य के साहित्य अब 
बचते कहाँ हैं ?

शेर के हैं 'शेर' जो 
फिरते अरण्य में, 
तब अनोखा शेर ही 
भरमा रहा था। 

जी करे है,कान पकड़ूँ 

रे ! रे ! निर्लज्ज 
बता-बता अपनी विरासत 
दिखला रहा था। 

लेखनी का खेल न

पृष्ठों की जरूरत 
खेल है विज्ञान का निष्ठुर सत्य-सा 
कोने में साहित्य बैठा 
गम खा रहा था। 

विडम्बना है विधाओं की 

अब तक निराली 
त्याग से अर्जित किया था जो भी उसने 
ऐश की बाँहों में खर्चे जा रहा था। 

दे रही चिड़िया सयानी 

उनको नसीहत 
क्या करूँ ! समझा नहीं हूँ 
कहते-कहते 
घोसलों को उनके 
तोड़े जा रहा था। 

साहित्य ही है धर्म !

जब उसने कहा था।  

'एकलव्य' 
    

मंगलवार, 19 जून 2018

अप्रगतिवादी सोच का मानव !



लालसा उस बौर की 
अमिया की डाली पर 
पल्लवित-पुष्पित होती। 
नाहक था इंतजार 
छोटी-छोटी अमिया !
लू चलती
हवाओं के थपेड़े में 
नंग-धडंग, पेड़ की छाँव में 
बैठे हम। 
गमछे की पोटली से निकालता 'रमुआ'
नमक,मिर्च की पुड़िया,
छील रहा था 'काका'
अमिया को,
तालाब से निकले उस सीप के 
चाकू से,
दक्षतापूर्वक बड़े। 
प्रतीक्षा थी सभी को, 
अमिया के उस छिलके की 
अमृत-सा था स्वाद जिसका 
तुलना में,
प्रगतिवादी सोच के मॉडर्न पिज़्जा,बर्गर से। 
बेहतर था,खुली हवा में 
मुफत के उस अमिया का स्वाद,
दौड़ती-भागती जिंदगी के 
बंद वातानुकूलित कक्ष से। 
बिना कपड़ों के,
कीचड़ से भरे तालाब में 
लंच में, अमिया का स्वाद लेने के पश्चात् 
खेलना, ताल-तलैया 
अनुभूति होती थी 
स्वर्ग-सी !
तुलना में,केवड़े के पानी से भरे 
स्वीमिंग पूल में 
बेहतर था,
अप्रगतिवादी सोच का 
मानव मैं !
बेहतर था। .........    
                                                     
'एकलव्य'          
                                    छायाचित्र : साभार गूगल 

बुधवार, 30 मई 2018

बाज़ारू हूँ ! कहके....


                                                   बाज़ारू हूँ ! कहके.... 



बंध के बजती पैरों में मैं 
चाहे सुबह हो शाम 
ले आती मैं,प्यार के बादल 
हो कोई खासो-आम। 

कभी नायिका के पैरों बंधकर, 

मैं महफ़िल रंगीन करूँ। 
नई-नवेली दुल्हन बनकर 
पिया का घर खुशियों से भरूँ। 

ये समाज बांटे है मुझको 

दुनिया के दो खेमों में, 
बिन ब्याही घुँघरू जो पहनूँ 
गोरे-गोरे पाँवों में। 

रात भए जो लोग हैं कहते 

स्वर्ग अप्सरा मान मुझे,
बनकर भगवन प्राण लुटाते 
रात जाती हो भोर तले। 

हो प्रकाश जो दिनकर आयें 

छँटा अँधेरा,चंद्र तले 
अब लगती मैं सुरसा डायन 
वही समाज है छींटा कंसे। 

वही कहें हैं,तू है पतिता !

जीवन का सर्वनाश करे। 
रात्रि हुए थी प्राणदायिनी !
दिन के उजाले प्राण हरे। 

अंधकार में कुछ ने लूटे 

कहकर प्रिय हो लाज मेरे 
वही प्रकाश में कहते मुझको 
पाप है तू ,दुनिया में बसे। 

जो मंदिरा अधरों से लगायें 

छन-छन सुनकर राग कहें 
अचेत-चेत जो अपने खोये 
मन में ना वैराग्य जगे। 

धर्म-अधर्म की बातें करते

बैठ धर्म की सीढ़ी पर
क्षणभर में वो भूल ही जाते 
कल बैठे थे कोठे पर। 

मेरा क्या है ! मैं तो बजती 

मंदिर से चौराहों पर 
स्वर जो निकले,कभी न बदले
मानव की इच्छाओं पर। 

स्मरण मुझे है, मैं थी दुल्हन 

बँधी थी मैं, लाल रंग लगे 
ऐश्वर्य ढका घूँघट में मेरे 
बना समाज था लाज मेरे। 

हर कोई देखा था मुझको 

भरे सम्मान के नयनों से 
खिल जातीं थीं बाँछे मेरी 
हो अभिभूत उन नेत्रों से। 

हुई थी विधवा, मैं जो पगली 

नयन वही, जो मलिन हुए। 
बनें थे पायल गम के आँसू 
बंधकर जो डोली थे चढ़े। 

कभी दीये जो घर के जलाये 

करूँ मैं रौशन महफ़िल आज। 
बनकर चली सम्मान किसी दिन 
दिन है आज,जो खोऊँ लाज़ !

शब्दों की ये अदला-बदली 

समझ सकी ना, जो मैं पगली 
दिया था रुतबा देवी कहके 
आज उतारे हैं ,बाज़ारू हूँ, 
जो कहके.............. !





                                                   "एकलव्य"
छायाचित्र : साभार गूगल 

शनिवार, 26 मई 2018

ख़त्म करो !


              
               ख़त्म करो !


हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

गुड़-गुड़ करते इस उदरपूर्ति को,
ठिठुरन-सी सर्दी रातों में 
मिथ्या चादर-सा स्वप्न लिए 
मोटों से पानी खींचा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
 दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है।

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।.......  

बिन ब्याहे श्रृंगार किया 
सारे सपनों को पार किया 
विक्राल नहीं थे ! क्षणिक स्वप्न 
बस दो जून की रोटी को,
उनको आडम्बर बेचा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

राजधानी न्याय की 
नई दिल्ली !
कहते-कहते मैं रोती हूँ।  
सीवर का पानी मुँह भरके 
तन को ठंडक मैं देती हूँ। 
अन्याय की चौखट पर मैंने, 
यूँ न्याय को बिकते देखा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

नारी-शक्ति के ज़ुमले दिए 
सरकारें आनी-जानी हैं।  
कल वे कुर्सी पर बैठे थे,  
आज कोई यूँ ऐंठा है। 
न्याय की लाख गुहार लिए 
मैंने परिवर्तन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

धर्मों की, क्या मैं बात करूँ !
उनके ईश्वर लाचार हुए, 
पर-निज के मिथ्या जांतें में 
खुद को पिसते 
बरबस ही देखा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

माँग रही हूँ .........
न्याय आज भी,
व्यंग भरी उन नज़रों से 
करके प्रदर्शित, प्रत्यक्ष स्वयं को 
उनको लड़ते देखा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

बहुत हुईं अन्याय की बातें 
ठंडी-सी,अब न्याय की बातें 
स्वप्न सही,परन्तु,लेकिन ...... 
स्वयं को उड़ते देखा है....... !

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

(प्रस्तुत 'रचना 'मेरे तीन वर्ष विद्यार्थी के रूप में दिल्ली प्रवास के दौरान हुए सत्य अनुभवों पर आधारित है। )
                                             'एकलव्य'
                                                         



     छायाचित्र स्रोत : साभार गूगल