Friday, 23 June 2017

"मुट्ठियाँ बना ज़रा-ज़रा"

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा
हवाओं को लपेट  के  तू ,  आंधियाँ बना -बना
लहू की  गर्मियों से तूं , मशाल तो जला -जला
जला दे ग़म के शामियां ,नई सुबह तो ला ज़रा
                                                               
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

भूल जा तूँ जिंदगी ,मौत को गले लगा
झूठ की जो लालसा ,मन से तू निकाल दे
सपनों के पुलिंदों को ,कदमों से ठोकर मार दे
क़िस्मत मिलेगी धूल में ,माथे से लगा ज़रा
                                                                                                
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

सोच मत तू है धरा ,पंख तो फैला ज़रा
उड़ जा आसमान में ,विश्वास से भरा -भरा
देख  मत  यूं  मुड़ के  तूं ,  लौटने के वास्ते
क़िस्मत को कर ले तू बुलंद ,कठिन हैं ये रास्ते
बना ले ख़ुद को क़ाबिले ,लोगों के मिसाल की
अमिट लक़ीर खींच दे ,ब्रहमांड में खरा -खरा
                                             
अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

व्यक्तित्व बन पहचान की ,अपने को ज़रा -ज़रा
दुनियां गले लगाएगी ,कोटि -कोटि ,धरा - धरा
चक्षुएं   बिछाएगी ,यहाँ -वहां ,  जहाँ  -तहाँ
ईश्वर भी मुस्कुराएगा , देखकर तेरी अदा
वो भी सिर झुकायेगा ,देर ही सही ज़रा

अंगुलियाँ समेट के तू , मुट्ठियाँ बना ज़रा -ज़रा

                               "एकलव्य "     


                                           

Thursday, 22 June 2017

''पथ के रज''

गा रहीं हैं,सूनी सड़कें 
ओ ! पथिक 
तूँ लौट आ 
भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता 
नींद से ख़ुद को जगा 

प्रतिक्षण प्रशंसा स्वयं लूटे 
मिथ्या ही राजा बना 
चरणों की , तूँ धूल है  
सत्य विस्मृत कर चला 

क्षणभर की है ये रौशनी 
रात्रि में है दिन दिखे 
माया मिली ये रात्रि है 
जिसमें आकर,जा फँसा 

ललाट पे होकर खींची
जीवन की कटु सच्चाईयाँ 
पोंछना तूँ व्यर्थ चाहे 
भाग्य की अंगड़ाईयाँ 

सड़क से होती शुरू 
अंत होंगी सड़क पे 
जन्म से पीछा छुड़ाता 
मृत्यु ही परछाईयाँ 

रुक पथिक ! मत जा उधर 
नहीं कोई, तेरा यहाँ 
साक्षात्कार सत्य से करातीं 
तेरी ये परेशानियाँ 

महल हैं, दिखावे की ख़ातिर 
पराये वो, तेरे नहीं 
भूलने का प्रयत्न करता 
अपनी अनुपम झोपड़ी 

बच्चे भूखे तेरे भले हैं 
स्नेह से बुलाते अभी 
चूल्हे पर भोजन बनाती 
प्यारी तेरी, अर्धांगिनी
खोज क्यूँ ? जीवन की करता 
अंत है तेरा यही,    

 गा रहीं हैं,सूनी सड़कें 
ओ ! पथिक 
तूँ लौट आ 
भ्रम में क्यूँ ? सपनें है बुनता 
नींद से ख़ुद को जगा ....... 


"एकलव्य" 








  

Friday, 16 June 2017

"न्याय की वेदी"

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !
लज्ज़ा तनिक 
न तुझको 
हाथ रखे है !
सिर पर 

मैं रंज सदैव ही 
करता 
मानुष स्वयं हूँ 
कहकर  
लाशों के ढेर पे 
बैठा 
बन ! निर्लज्ज़ 
तूँ मरघट 

स्वर चीखतीं ! हरदम 
मेरे श्रवण से होकर 
हिम सा ! द्रवित 
हृदय होता है
 शोक की 
ऊष्मा पाकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !

सुनकर ! अनसुनी 
करता 
क्यूँ ? आवेश में 
आकर 

सुन ले ! नश्वर 
ओ ! मानव 
अंत भी तेरा 
निश्चित 
काल समीप है 
तेरे 
बन ! छाया सा 
दानव 

जो आज हैं 
चीथड़ों में लिपटे 
कल वे भी 
मारे जाएंगे !
तूँ राजवस्त्र ! पहनता 
वे तुझको भी 
दफ़नायेंगे !

तूँ क्यूँ ? माटी से 
बचता 
कलंक है माटी 
कहकर 
कलंकित होगा 
पवित्र ! शरीर 
इसी कलंक में 
मिलकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !

पाषाण बिछेंगे ! तुमपर 
सिर से छाती पर 
होकर 
पशु रौंदेंगे ! तुझको 
पथ सामान्य 
समझकर 
घास उगेंगे ! तुझपर 
मेरा डेरा है 
कहकर 
संसार करेगा ! विस्मृत 
कटु इतिहास 
समझकर 
पीड़ित तुझको ही 
कोसेंगे !
घूँटें जल की 
पी-पीकर 

मैं भी गुजरूंगा ! तेरी 
सूनी गलियों से 
होकर 
मुस्कान के व्यंग 
चलाऊँगा ! तेरे 
कर्मों पर 
हँसकर 

मैं प्रश्न पूछता 
अक़्सर !
न्याय की वेदी 
पर चढ़कर !



"एकलव्य" 

Saturday, 10 June 2017

"कालनिर्माता"

स्वीकार करता हूँ मानव संरचना कोशिका रूपी एक सूक्ष्म इकाई मात्र से निर्मित हुई है और यह भी स्वीकार्य है जिसपर मुख्य अधिकार हमारे विक्राल शरीर का है किन्तु यह भी सारभौमिक सत्य है कोशिका रूपी ये इकाई ही हमारे विक्राल शरीर का मूलभूत आधार है जिस प्रकार हमारे राष्ट्र का मूलभूत आधार 'किसान' ! परन्तु  आज उसी अन्नदाता की अनदेखी देश कर रहा है जो न्यायोचित नही,भविष्य में इसके विध्वंसक परिणाम होना तय है यदि हम नहीं चेते ! उस ईश्वररूपी संसार पालक को उसका हक़ नहीं दिया ! देश अपनी बर्बादी का स्वयं जिम्मेदार होगा। धन्यवाद 

"एकलव्य" 


 रे ! मानव

तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा
ब्रह्माण्ड जो तेरा
रचते हैं
पृथ्वी की काया
गढ़ते हैं !
सम्मान, तूँ उनका
तौल रहा

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा

मृदा स्वर्ण ! बनायें
कण से
फल जो हल का
लगायें ! तल में
पाषाण खोद ! उठायें
कर से
क्यूँ ? उनका हक़
छीन रहा
जीवन है, उनका
दीन बना

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा

पाता चैन तूँ
चार-चौबारी
वे घूमें हैं !
क्यांरी-क्यांरी 
खड्ग पहन तूं
चला ! शौक़ से
मूँछ ऐंठता ! बड़े
रौब से
वस्त्र नहीं, उनके
तन लगते
नग्न पाँव ना
चप्पल सजते

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  

सांय-प्रातः तूँ 
दीप जलाये 
छप्पन भोग 
पत्थर को लगाए 
विश्व पुरोहित स्वयं 
कहाए !
नहीं अन्नोत्पत्ति 
क्यूँ ? दायित्व तुम्हारा 
मिथ्या ज्ञान तूँ , व्यर्थ 
बघारे  !
बता नीच उन्हें 
बारी-बारी 

स्वयं उच्च 
बना ! बैठा है 
मृदा धूषित 
उनकी लाचारी  

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  

जाग ! तनिक 
तूँ, जग निर्माता 
लगा गले ! जो 
अन्न का दाता 
दे ! सम्मान, जो 
हक़ उनका है  
बना उनको ही 
भाग्य विधाता !

नहीं काम,आयेंगे तेरे 
वेद ! पुराण,क़ुरान व गीता 
जब क्षुधा,उदर में 
नाचेगी !
बन जाएगा ! क्षण में 
माटी, आह ! जो 
उनकी जागेगी !

रे ! मानव
तूँ भूल रहा
क्यूँ ? स्वप्नों में
झूल रहा  



"एकलव्य" 
  

Monday, 29 May 2017

"प्राणदायिनी"

वो दूध पिलाती 
माता !
वो गले लगाती 
माता !
कोमल चक्षु में 
अश्रु लेकर 
तुझे बुलाती 
माता !

वो जग दिखलाती 
माता !
तुझको बहलाती 
माता !
तेरे सिर को 
हृदय लगाये 
ब्रह्माण्ड समेटे 
गाथा !

रोती सड़क पे 
माता !
जिसको छोड़ा 
तूने कहकर 
अब तेरा 
भाग्य ! विधाता 

स्मरण नहीं क्या ? तुझको 
आता !
ईश्वर का स्पर्श थी 
माता !
हुआ आज मन 
कलुषित ! तेरा 
कहता, तुझमें 
दरिद्र समाता !

लालचवश है 
बोझ ! बताता 
गृह तेरा संकीर्ण 
हुआ रे !
बूढ़ी माँ को 
व्यर्थ रूलाता !

देख ! तनिक तूं
नयन में उसके 
तीनों लोक है 
माता !
क्यूँ ? करता,फेरे 
मंदिर-मस्ज़िद के 
अनुपम ! ख़ुदा 
बुलाता 

रे ! पापी 
निर्लज्ज तूँ मानव
तुझको कुछ नहीं 
आता !
ईश्वर की,स्वर्ग सी 
भेंट है वो !
जिसको तूँ 
बिसराता 

मुक्ति मार्ग ! की 
इच्छा करता 
मन, वन-वन 
भटकाता 
देख ! वही है 
ज्ञान पुंज,
जिसको देख 
न पाता 

बिन उसके 
दुनियां में कौन ? रोटी 
तुझे खिलाता 
प्राणदायिनी ! जननी वो 
तूँ जिसको, ठुकराता 

हे ! मानव 
तूँ देख ! तनिक 
जीवन, प्राण-पिपासा 
तेरी प्यारी 
माता !   

वो दूध पिलाती 
माता !
वो गले लगाती 
माता !


                          "एकलव्य"                                                    

    

Monday, 22 May 2017

''विजय पताका''

वे शहद 
चटातें हैं !
तुमको 
मैं नमक 
लगाता हूँ !
तुमको 

वे स्वप्न 
दिखाते हैं !
तुमको 
मैं झलक 
दिखाता हूँ !
तुमको 

वे रंग लगातें हैं !
तुमको 
मैं रक्त 
दिखाता हूँ !
तुमको 

गर्दन पर चाकू 
मलते हैं ! वे 
मैं बलि 
चढ़ाता हूँ !
तुमको 

झांसे में रखते ! वे 
प्रतिक्षण 
मैं सत्य 
दिखाता हूँ !
तुमको 

आह्लादित करते ! वे
पल-पल 
निर्लज्ज बनाता हूँ !
तुमको 

विस्मृत कराते !
शक्ति तेरी 
मैं स्मरण  कराता हूँ !
तुमको 

वे मौन बताते !
सभ्य ज्ञान 
उदण्ड बनाता हूँ !
तुमको 

तुझमें रचते ! वे 
नीति कूट 
मैं रण में लाता हूँ !
तुमको 

शस्त्र त्याग ! तूँ 
हे ! अर्जुन 
उपदेश बताते ! वे 
तुमको 
करता हूँ ! मैं 
शंखनाद 
महाभारत रण लाता 
तुमको 

उठ जा ! हे 
तूँ,मानव पुत्र 
रथ में बैठा ! मैं 
तेरे साथ 

तूँ देख ! अनोखा 
लक्ष्य अडिग 
भेद उसे तूँ ! कर 
प्रहार 

उत्पन्न करेंगे ! विघ्न बड़े 
शत्रु सदैव ही 
शत-शत बार 

नाश करेगा ! स्वयं 
शौर्य से 
कूट रचित 
शत्रु जंजाल 

फहरायेगा ! 'विजय पताका' 
राष्ट्र नहीं 
ब्रह्माण्ड ! विशाल 

अविस्मरणीय होगी 
कीर्ति तेरी 
पाँव पड़ेंगे 
धरा ! महान 


"एकलव्य" 

Saturday, 20 May 2017

"मुक्ति मार्ग"

इस लोक में
जन्मा !
अज्ञानी
कूट छिपा
मैं
अभिमानी !
सुन्दर तल हैं
'कर' के मेरे
जिनसे करता हूँ
नादानी !
समय शेष है
अहम् का
मेरे
भ्रमित विचरता !
माया वन
में
भ्रम रूपी मुझे
हिरण दिखे है
स्वप्न दिवा की
बात कहे है
काक मुझे
कोयल
प्रतीत हो !
कर्कश वाणी
अमृत ! वर्षा के
मान स्वर
दिन-रात
पिये हो
सत्य प्रतीत हो
दुर्जन मेरा
काल ! बुलाऊँ
बना ! सवेरा
मोहिनी के
मंदिरा ! का
प्यासा
गढ़ूँ ! मिथ्या
सुन्दर
अभिलाषा !
ज्ञानी को मैं
मूर्ख
बताऊँ !
बता स्वयं
ज्ञानी
कहलाऊँ
मधुशाला ! अब
बना है
मंदिर
करूँ मैं
अपना
आत्म समर्पित !
आत्मोत्सर्ग की 
पराकाष्ठा 
ख़ूब ! बनाऊँ 
उन्मुख होकर 
घर बैठी 
अर्धांगिनी रोये !
बुझा-बुझा के 
मुझको सोये 
रात्रि भए हो 
किवाड़ बुलाऊँ !
अर्द्ध निद्रा उसे 
जगाऊँ 
जिह्वा खोले !
छला बताऊँ 
स्वयं को मैं 
रणवीर बनाऊँ 
सांय-प्रातः ! मैं 
रोज कमाऊँ 
मधुशाला ! में 
ख़ूब लुटाऊँ
पी-पीकर 
मरणासन्न ! 
जाऊँ 
यही मुक्ति ! मैं 
मार्ग 
बताऊँ 


"एकलव्य"