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रविवार, 8 जुलाई 2018

काहे बोला !

साहित्य ही है 'धर्म' !
जब उसने कहा था 
तंज की गहराइयों में 
जा फँसा था। 
लेखनी चम-चम बनी थी
प्रगति द्योत्तक !
जा रे ! जा ! बहरूपिये 
झुठला रहा था। 

बुद्धिजीवी साहित्य के थे 

वे पुलिंदे,
कोने-कोने में छुपा 
भय खा रहा था। 

रे फिरंगी ! प्रतियाँ जलाईं 

क्यों रे ! उनकी 
जग में कोलाहल मचा 
वो गा रहा था। 

भूत के वे 'भूत'

शोर करते यहाँ हैं  
सत्य के साहित्य अब 
बचते कहाँ हैं ?

शेर के हैं 'शेर' जो 
फिरते अरण्य में, 
तब अनोखा शेर ही 
भरमा रहा था। 

जी करे है,कान पकड़ूँ 

रे ! रे ! निर्लज्ज 
बता-बता अपनी विरासत 
दिखला रहा था। 

लेखनी का खेल न

पृष्ठों की जरूरत 
खेल है विज्ञान का निष्ठुर सत्य-सा 
कोने में साहित्य बैठा 
गम खा रहा था। 

विडम्बना है विधाओं की 

अब तक निराली 
त्याग से अर्जित किया था जो भी उसने 
ऐश की बाँहों में खर्चे जा रहा था। 

दे रही चिड़िया सयानी 

उनको नसीहत 
क्या करूँ ! समझा नहीं हूँ 
कहते-कहते 
घोसलों को उनके 
तोड़े जा रहा था। 

साहित्य ही है धर्म !

जब उसने कहा था।  

'एकलव्य' 
    

मंगलवार, 19 जून 2018

अप्रगतिवादी सोच का मानव !



लालसा उस बौर की 
अमिया की डाली पर 
पल्लवित-पुष्पित होती। 
नाहक था इंतजार 
छोटी-छोटी अमिया !
लू चलती
हवाओं के थपेड़े में 
नंग-धडंग, पेड़ की छाँव में 
बैठे हम। 
गमछे की पोटली से निकालता 'रमुआ'
नमक,मिर्च की पुड़िया,
छील रहा था 'काका'
अमिया को,
तालाब से निकले उस सीप के 
चाकू से,
दक्षतापूर्वक बड़े। 
प्रतीक्षा थी सभी को, 
अमिया के उस छिलके की 
अमृत-सा था स्वाद जिसका 
तुलना में,
प्रगतिवादी सोच के मॉडर्न पिज़्जा,बर्गर से। 
बेहतर था,खुली हवा में 
मुफत के उस अमिया का स्वाद,
दौड़ती-भागती जिंदगी के 
बंद वातानुकूलित कक्ष से। 
बिना कपड़ों के,
कीचड़ से भरे तालाब में 
लंच में, अमिया का स्वाद लेने के पश्चात् 
खेलना, ताल-तलैया 
अनुभूति होती थी 
स्वर्ग-सी !
तुलना में,केवड़े के पानी से भरे 
स्वीमिंग पूल में 
बेहतर था,
अप्रगतिवादी सोच का 
मानव मैं !
बेहतर था। .........    
                                                     
'एकलव्य'          
                                    छायाचित्र : साभार गूगल 

बुधवार, 30 मई 2018

बाज़ारू हूँ ! कहके....


                                                   बाज़ारू हूँ ! कहके.... 



बंध के बजती पैरों में मैं 
चाहे सुबह हो शाम 
ले आती मैं,प्यार के बादल 
हो कोई खासो-आम। 

कभी नायिका के पैरों बंधकर, 

मैं महफ़िल रंगीन करूँ। 
नई-नवेली दुल्हन बनकर 
पिया का घर खुशियों से भरूँ। 

ये समाज बांटे है मुझको 

दुनिया के दो खेमों में, 
बिन ब्याही घुँघरू जो पहनूँ 
गोरे-गोरे पाँवों में। 

रात भए जो लोग हैं कहते 

स्वर्ग अप्सरा मान मुझे,
बनकर भगवन प्राण लुटाते 
रात जाती हो भोर तले। 

हो प्रकाश जो दिनकर आयें 

छँटा अँधेरा,चंद्र तले 
अब लगती मैं सुरसा डायन 
वही समाज है छींटा कंसे। 

वही कहें हैं,तू है पतिता !

जीवन का सर्वनाश करे। 
रात्रि हुए थी प्राणदायिनी !
दिन के उजाले प्राण हरे। 

अंधकार में कुछ ने लूटे 

कहकर प्रिय हो लाज मेरे 
वही प्रकाश में कहते मुझको 
पाप है तू ,दुनिया में बसे। 

जो मंदिरा अधरों से लगायें 

छन-छन सुनकर राग कहें 
अचेत-चेत जो अपने खोये 
मन में ना वैराग्य जगे। 

धर्म-अधर्म की बातें करते

बैठ धर्म की सीढ़ी पर
क्षणभर में वो भूल ही जाते 
कल बैठे थे कोठे पर। 

मेरा क्या है ! मैं तो बजती 

मंदिर से चौराहों पर 
स्वर जो निकले,कभी न बदले
मानव की इच्छाओं पर। 

स्मरण मुझे है, मैं थी दुल्हन 

बँधी थी मैं, लाल रंग लगे 
ऐश्वर्य ढका घूँघट में मेरे 
बना समाज था लाज मेरे। 

हर कोई देखा था मुझको 

भरे सम्मान के नयनों से 
खिल जातीं थीं बाँछे मेरी 
हो अभिभूत उन नेत्रों से। 

हुई थी विधवा, मैं जो पगली 

नयन वही, जो मलिन हुए। 
बनें थे पायल गम के आँसू 
बंधकर जो डोली थे चढ़े। 

कभी दीये जो घर के जलाये 

करूँ मैं रौशन महफ़िल आज। 
बनकर चली सम्मान किसी दिन 
दिन है आज,जो खोऊँ लाज़ !

शब्दों की ये अदला-बदली 

समझ सकी ना, जो मैं पगली 
दिया था रुतबा देवी कहके 
आज उतारे हैं ,बाज़ारू हूँ, 
जो कहके.............. !





                                                   "एकलव्य"
छायाचित्र : साभार गूगल 

शनिवार, 26 मई 2018

ख़त्म करो !


              
               ख़त्म करो !


हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

गुड़-गुड़ करते इस उदरपूर्ति को,
ठिठुरन-सी सर्दी रातों में 
मिथ्या चादर-सा स्वप्न लिए 
मोटों से पानी खींचा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
 दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है।

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।.......  

बिन ब्याहे श्रृंगार किया 
सारे सपनों को पार किया 
विक्राल नहीं थे ! क्षणिक स्वप्न 
बस दो जून की रोटी को,
उनको आडम्बर बेचा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

राजधानी न्याय की 
नई दिल्ली !
कहते-कहते मैं रोती हूँ।  
सीवर का पानी मुँह भरके 
तन को ठंडक मैं देती हूँ। 
अन्याय की चौखट पर मैंने, 
यूँ न्याय को बिकते देखा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

नारी-शक्ति के ज़ुमले दिए 
सरकारें आनी-जानी हैं।  
कल वे कुर्सी पर बैठे थे,  
आज कोई यूँ ऐंठा है। 
न्याय की लाख गुहार लिए 
मैंने परिवर्तन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

धर्मों की, क्या मैं बात करूँ !
उनके ईश्वर लाचार हुए, 
पर-निज के मिथ्या जांतें में 
खुद को पिसते 
बरबस ही देखा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

माँग रही हूँ .........
न्याय आज भी,
व्यंग भरी उन नज़रों से 
करके प्रदर्शित, प्रत्यक्ष स्वयं को 
उनको लड़ते देखा है। 

 हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

बहुत हुईं अन्याय की बातें 
ठंडी-सी,अब न्याय की बातें 
स्वप्न सही,परन्तु,लेकिन ...... 
स्वयं को उड़ते देखा है....... !

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है। 
दिल्ली की उन सड़कों पर 
अपना कलुषित मन बेचा है। 

हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।....... 

(प्रस्तुत 'रचना 'मेरे तीन वर्ष विद्यार्थी के रूप में दिल्ली प्रवास के दौरान हुए सत्य अनुभवों पर आधारित है। )
                                             'एकलव्य'
                                                         



     छायाचित्र स्रोत : साभार गूगल 

बुधवार, 16 मई 2018

चार पाए




घर के कोने में 
बैठा-बैठा फूँक रहा हूँ,
उस अधजली सिगरेट को। 

कुछ वक़्त हो चला है,
फूँकते-फूँकते
धूम्र-अग्नि से बना 
क्षणिक मिश्रण वह। 

डगमगा रहे हैं पाए 
कुर्सी के 
बैठा हूँ जिसपर,
कारण वाज़िब है ! 

तीन टाँगों वाली,वह कुर्सी 
बैठकर सोचता हूँ मैं,
जीवन के वो हसीन पल !
फेरता हुआ पकी दाढ़ी पर 
हाथ अपने। 

उखाड़ता हूँ,रह-रहकर 
कुछ बाल पके-से 
छुपाने हेतु,
अपने उम्र की नज़ाकत !
मरते थे दुनियावाले जिसपर। 

तब बात भी कुछ और थी 
उस कुर्सी की। .... 

हिलती नहीं थी इतनी,
सिगरेट के प्रत्येक कश पर 
ज़ाहिर है !.... 

रहे होंगे 
चार पाए उसके 
जीवित !
मेरी जिंदगी की तरह..... ।  

( निराशा के भंवर में फँसा मैं ! )


'एकलव्य' 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

स्वप्न में लिखता गया कुछ पंक्तियाँ !

क्या करूँगा ! ये ज़माना रुख़्सत करेगा 
चस्पा करेगा गालियाँ मुझपर हज़ारों। 

कुछ कह सुनायेंगे, तू बड़ा ज़ालिम था पगले !
कुछ होके पागल याद में,नाचा करेंगे। 


मैं जा रहा हूँ ज़िंदगी 
तूँ लौट आ !
गा रहा हूँ गीत जीवन 
धुन बना !

मर रहा हूँ 
मैं जो प्रतिक्षण 
दोष मेरा 
इल्तिज़ा तुझसे है बाक़ी 
मान जा !

कुछ फूँकते शहनाईयाँ 
क़ब्र पर मेरे, 
नापसंद यह धुन मुझे 
अब क्या करूँ ?
कहकर विदाई दे रहे 
अंतिम यहाँ। 


सोया पड़ा हूँ 
देखकर 
चिल्ला रही माँ। 
मिन्नतें कर-करके हारी 
फुसला रही माँ। 
लाल उठ जा ! भोर हुई 
बतला रही माँ। 
देर तक सोना नहीं !
समझा रही माँ। 

पर क्या करूँ !
अशक्त-सा 
मैं हूँ पड़ा। 

चादर ओढ़ाते देखकर 
घबरा रही माँ। 
मुझको लिटाते, सोचकर 
गंगा बहा रही माँ। 
बाँस की तख़्ती पर पसरा 
तकिया लगा रही माँ। 

चार कांधे तैयार हैं 
ढोने को मुझे हो नग्न से !
खींच-खींच तख़्ती मेरी 
बिठा रही माँ। 

जूठे पड़े हैं बर्तनों के ढेर-से 
आज ख़ुश हूँ देखकर 
क्यूँ रो रही माँ ?
⧫  

वक़्त आ गया है,चलने का मेरे 
छोड़ माँ ! तख़्ती मेरी 
फिर लौट आने के लिए। 

सोच ले ! तूँ फिर झुलाएगी मुझे 
डोरियों में हाँथ बाँधे,स्वप्न-सा। 
⧫   

मैं फिर से मुँह में भरकर माटी खाऊँगा। 
भागेगी मेरे पीछे तूँ बन पगली-सी  
दीवारों की ओट में छिप जाऊँगा। 

रोने का नाटक करेगी, झूठी तूँ  
मोम-सा हृदय मैं पिघलाऊँगा। 

चिपकाऊँगा नन्ही उँगलियाँ,नेत्रों पर तेरे
पूछूँगा ! मैं कौन हूँ ? बतलाऊँगा। 

आँगन में पुनः मैं 
लाल बनकर आऊँगा।    

                                 'एकलव्य' 

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

मच्छर बहुत हैं !

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 
बात कुछ और है 
उनकी गली की !

लिक्विडेटर लगाकर सोते हैं वे 
भेजने को गलियों में मेरे 
क्योंकि !
संवेदनाएं न शेष हैं ,अब 
मानवता की। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

पानी ही पानी रह गया 
घुलकर रसायन रक्त में 
अब कह दिया है 
छोड़ने को 
गालियाँ जो उनकी 
थीं कभी
उन मच्छरों से। 

क्या करूँ,
दिल है बड़ा 
मेरा अभी भी 
अंजान मेहमानों के लिए 
सो मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

चूसना है 
चूस लो !
ऐ उड़ने वालों 
फ़र्क क्या ? 
उनकी गलियों के निवासी 
तुम थे कभी। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

धीरज धरो ! तुम ना डरो 
जेब है ख़ाली मेरी। 
अशक्त हूँ और त्रस्त भी 
उनकी कृपा है। 

'लिक्विडेटर' ,बात छोड़ो !
रोटी के लाले पड़े हैं। 
श्वास जब तक
है भरोसा !
मेरी रहेंगी सर्वदा 
गालियाँ खुलीं। 

मच्छर बहुत हैं,आजकल 
गलियों में मेरे। 

मत लजाना ! 
रोज आना  
रक्तपान कर 
तृप्ति पाना। 
जो मिले 
उनको भी लाना।   

हा ....हा ... हा।  
क्या करूँ ?
मच्छर बहुत हैं, आजकल
गलियों में मेरे।  

"एकलव्य" 
छायाचित्र :साभार गूगल