Friday, 15 December 2017

''अविराम लेखनी''


''अविराम लेखनी'' 


लिखता जा रे !
तूँ है लेखक 
रिकार्ड तोड़ रचनाओं की 
गलत वही है 
तूँ जो सही है 
घोंट गला !
आलोचनाओं की 
पुष्प प्रदत्त कर दे रे ! उनको 
दिन में जो कई बार लिखें 
लात मार दे ! कसकर 
उनको 
जीवन में एक बार 
लिखें 
लिख -लिख पगले 
भर -भर स्याही 
जब जी चाहे छाती पे 
लगा -लगा कर धूम मचा दे 
सौ टिप्पणियाँ 
'राही' की 
सोच न उनको, जो हैं लिखते 
सत्य काव्य सा अनुभव को 
वो हैं मूरख, सोचने वाले 
करते बातें मानव की 
लिखता जा अविराम लेखनी 
लिखने का तूँ आदी है 
कर दे तूँ सूर्यास्त साहित्य का 
तुझमें हिम्मत बाक़ी है !

आज लिख रहा तेरी महिमा 
अनपढ़ सा मैं सोचने वाला 
वाह रे ! फ़कीर जो तूने किया  
साहित्य समाज का सच्चा रखवाला 


( दिन में सौ रचनायें लिखने वाले सम्माननीय लेखकों को "एकलव्य" का दंडवत नमन। )


"एकलव्य"   

Monday, 4 December 2017

'शोषित'

'शोषित' 


बापू ! बड़ी प्यास लगी है 
पेट में पहले आग लगी है 
थोड़ा पानी पी लूँ क्या !
क्षणभर जीवन जी लूँ क्या !

धैर्य रखो ! थोड़ा पीयूँगा 
संभल-संभल भर हाथ धरूँगा 
दे दो आज्ञा रे ! रे ! बापू 
सौ किरिया, एक बार जीयूँगा

ना ! ना ! 'बुधिया' कर नादानी 
पाप लगेगा पिया जो पानी 
'ब्रह्मज्ञान' ना तुझको 'मूरख' 
करता काहे जान की नौबत 

सुन 'बुधिया' ! कोई देख ले नाला 
ना मंदिर ना कोई 'शिवाला' 
देख नहर में शव जो पड़ा है 
नहीं कोई 'ज़ल्लाद' खड़ा है 

डाल दे अपने कलुषित मुख को 
पी ले नीर ,जो 'आत्मतृप्ति' हो

काहे ऊँची बात तूँ कहता 
धर्म-भेद के चक्कर पड़ता 

जन्म लिया है मेरे घर में 
जन्मजात अधिकार गंवाकर 

आधुनिकता का भाव न भाए 
सारभौम 'शोषित' कहलाये। .. 


( मानवता की प्रतीक्षा में )

"एकलव्य"  

Thursday, 23 November 2017

"पुनरावृत्ति"


"पुनरावृत्ति" 


'सोज़े वतन' अब बताने हम चले 
'लेखनी' का मूल क्या ?
तुझको जताने 
हम चले !

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले ..... 

भौंकती है भूख नंगी 
मरने लगे फुटपाथ पर 
नाचती निर्वस्त्र 'द्रौपदी' 
पांडवों की आड़ में 
हाथ में चक्र है 'सुदर्शन' 
लज्जा बचाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले....... 

धूप में तपते हुए 
वो हाँकता है प्रेम से 
पैरों में 'खड़ाऊँ' नहीं 
वो काँपता है,रातों में 
सर्दी की ठंडी रात्रि में 
वो तापता है आग में 
आग तो उदर में लगी 
कुछ क्षण,बुझाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले.......  

सपनें विखंडित हो चले 
मौसमों की मार से 
कुछ कर्ज़ उसने जो लिए 
गिरवी कर गहने ,उधार के 
सड़कों पर नीलाम हुआ 
'साहूकार' के मार से 
सस्ती हुई है आबरू 
उन कर्ज़ के दुकानों पे 

खरीदने को आबरू 
 बे-आबरू से बाज़ार में 
कौड़ियों से भरकर जेबें  
उनको दिखाने हम चले 

'सोज़े वतन', अब बताने हम चले....... 


( मैं फिर उगाऊँगा ! सपनें नये ) 

"एकलव्य"  

Monday, 13 November 2017

''अवशेष''

''अवशेष'' 


सम्भालो नित् नये आवेग 
रखकर रक़्त में 'संवेग' 
सम्मुख देखकर 'पर्वत' 
बदल ना ! बाँवरे फ़ितरत 
अभी तो दूर है जाना 
तुझे है लक्ष्य को पाना 
उड़ा दे धूल ओ ! पगले 
क़िस्मत है छिपी तेरी 
गिरा दे ! आँसू की 'गंगा'
धुल दे,पाप तूँ सारे 
मैं तो आऊँगा ! अक़्सर 
तय है 'गमन' मेरा 
कल 'मैं' सा रहूँगा तुझमे 
क्षण में टूट जाऊँगा 
पकड़ना चाहेगा मुझको 
पकड़ न आऊँगा तुझसे 
मुँह के बल गिरेगा तूँ 
पश्चाताप है कहके 
धूमिल सी कुटिल वाणी 
सुनेगी ना चिता अग्नि 
कहेंगे 'भस्म' से अवशेष 
बुझती तेरी कहानी  

( अनवरत जारी है ! सत्य की खोज )

"एकलव्य"  

Tuesday, 31 October 2017

''सती की तरह''

"सती की तरह" 

मैं आज भी हूँ 
सज रही 
सती की तरह 
ही मूक सी 
मुख हैं बंधे मेरे 
समाज की वर्जनाओं से 
खंडित कर रहें 
तर्क मेरे 
वैज्ञानिकी सोच रखने वाले 
अद्यतन सत्य ! भूत की वे 
ज्योत रखने वाले 
कभी -कभी हमें शब्दों से 
आह्लादित करते 
संज्ञा देकर देवी का 
शर्त रहने तक 
मूक बनूँ !
बना देते हैं 
सती क्षणभर में 
पीड़ा प्रस्फुटित होने पर 
सारभौमिक यही सत्य !
मैं आज भी हूँ 
सज रही 
सती की तरह 



"एकलव्य" 

एक अनुत्तरित सत्य की खोज आज भी है। 

Monday, 25 September 2017

"और वे जी उठे" !


"और वे जी उठे" !

मैं 'निराला' नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 
'दुष्यंत' की लेखनी का 
गुरूर ज़रूर हूँ 

'मुंशी' जी गायेंगे मेरे शब्दों में 
कुछ दर्द सुनायेंगे 
सवा शेर गेहूँ के 
एक बार मरूँगा पुनः 
साहूकार के खातों में 
भूखा नाचूँगा नंगे 
तेरे दरवाज़ों पे 
अपनी ही लेखनी का 
एक फ़ितूर ज़रूर हूँ   

मैं 'निराला' नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 
'दुष्यंत' की लेखनी का 
गुरूर ज़रूर हूँ 

वह आज भी तोड़ती पत्थर 
मिलती नहीं इलाहाबाद के पथ पर 
तलाश तो बहुत थी 
उसकी परछाईयों की 
रह गई वो इमारतों की 
नींव में धंसकर 

खोदता उस नींव को 
दिख जाये ! वो तोड़ने वाली 
उसके अस्तित्व को टटोलता 
क्षणभर का राहगीर ज़रूर हूँ 

मैं 'निराला' नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 
'दुष्यंत' की लेखनी का 
गुरूर ज़रूर हूँ 

मैं फिर हिलाऊँगा !
नींव की दीवार 
मैं फिर चलाऊँगा !
लाशें हजार 
मक़सद नहीं बलबा मचाने का 
शर्त 'दुष्यंत' का है 
तुझको जगाने का 
मैं सरफिरा सिपाही 
नशे में चूर हूँ 

 मैं 'निराला' नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 
'दुष्यंत' की लेखनी का 
गुरूर ज़रूर हूँ 

एक वक़्त था,जब कभी 
'मुर्दे' जगाता था 
वो वक़्त था,खामोख्वाह ही 
क़ब्रें हिलाता था 
जागे नहीं वो नींद से 
मर्ज़ी थी जो उनकी 
ज़िन्दों की बस्ती में 
आकर यहाँ 
आँसूं बहाता हूँ 
जग जा ! ओ जीवित मुर्दे 
मैं पगला दुहराता हूँ 
व्यर्थ स्वप्नों की पोटली 
बाँधता ज़रूर हूँ 

मैं 'निराला' नहीं 
प्रतिबिम्ब ज़रूर हूँ 
'दुष्यंत' की लेखनी का 
गुरूर ज़रूर हूँ 


"एकलव्य" 


Wednesday, 16 August 2017

''वही पेड़ बिना पत्तों के''

''वही पेड़ बिना पत्तों के''

वही पेड़
बिना पत्तों के 
झुरमुट से
झाँकता 
मन को मेरे 
भाँपता

कल नहीं सोया था 
एक निद्रा 
शीतल भरी 
उनके स्मरणों को 
संजोता हुआ

शुष्क हो चलें हैं 
जीवन के विचार 
पत्ते तो लगे हैं 
सूखी डालियों पे 
झड़ रहें हैं 
रह-रह कर 
अश्रु सा !
धरा की कोंख में

वर्षा तो आयेगी 
कर प्रतीक्षित बैठा है
स्वयं को छुपाए 
वो सोचता है

कुछ अपूर्ण विचार 
टटोलता हूँ 
कुछ स्मृतियाँ 
तोलता हूँ 
बरबस ही 
क्षणिक इच्छाओं के 
पतवार खेता हूँ

हृदयपटल पे जमी काई 
हरी हो जाती है 
प्रेम की 
कुछ बूंदें 
छलक जातीं हैं 
एक आस बनकर 
करतीं हैं 
पुनर्जीवित ! मुझको  
बुनने की प्रेरणा देती हुई 
जीवन के कई 
मकड़जाल  पुनः 

संदेह तो होता है 
प्रकृति की 
सहानुभूति पर 

एक बूँद का प्यासा 
मरुस्थल में भी 
मृगमरीचिका  को 
जलाशय कहता है

सदियों बीत गए 
स्मरण नहीं  
कब आईं थीं ?
ख़ुशियाँ !
मेरी चौखट पे 
खटखटाने  हृदयपट को 
वर्तमान झाँक रहा है 
मेरे अंतर्मन में
कुछ आशाओं की 
पोटली बाँधे 

बुलाता  है मुझे 
कहता है मेरे 
जंग लगे 
श्रवण में 
कुछ खुसफुसाहट भरे 
स्वर में 

मैं आया हूँ 
ओ ! मतवाले 
जाग जा !
स्वप्न की दुनिया से 
वास्तविक हूँ  मैं 
दिवास्वप्न नहीं

ले जाऊँगा ! तुझे 
दुनिया के उस पार
जहाँ न कोई 
दुःख होगा 
न ही सुख की 
मिथ्या स्मृतियाँ !

होंगी तो केवल 
तेरा वही अस्तित्व 
प्रकृति में समाता हुआ 
जीवन का रास्ता 
तुझे दिखाता हुआ

झूठी हँसी न होगी 
मुखमंडल पे तेरे 
अवसाद न होंगे 
हताशाओं के 
हृदयपटल पे !

जीवन का यही 
सारभौमिक सत्य 
तुझे दिखाऊँगा !
अपना तो नहीं
पराया भी नहीं
तुझे बनाऊँगा !


"एकलव्य"