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शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

बाट ( बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियाँ )


   बाट 
( बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियाँ )
"एक 'दर्पण' के टूटे हुए अनेक टुकड़े, जिनको मैं जितने भी शब्द दूँ, संभवतः पर्याप्त नहीं!"     


सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलाई। 
वो निर्लज्ज, परदेश बलमुआ
रात-खाट कुम्हलायी।  

चकिया भर-भर दाना पीसूँ 
डाले पिया खटाई। 
साँझ-सवेरे रोऊँ भर-भर,
अखियाँ नींद न आयी।  

सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलायी।  

ना चिट्ठी, कोई पाती आयी 
शोक पिया संदेशा लायी । 
घोरि-घोरि अब बीतन रतिया 
मोहे समझ न आयी । 

अंत समय निज आवन लागी 
टूटी खाट बिछायी । 
बंद हो रही अँखियन मोरी 
कैसी लगन लगायी । 

सपन सुन्दरी, पनघट गगरी 
मैं गोरिया अकुलायी ।



चितवन कैसी, रात चितेरे
मन जोगी संग लागा।
भींगा-भींगा हृदय भी प्यासा
दिन अति लागे माया।

  मुरगी पकड़ूँ कर से अपने
दौड़-दौड़कर द्वारे,
मेदिनी फिर-फिर झाड़ लगाऊँ
आ बैठूँ चौबारे।

साँझ भये घर दीपक धारूँ
निज फूँकू मुँह चूल्हा
खाँसत-खाँसत हारूँ मन से
चूल्हा बना है दूल्हा।

इस दूल्हे से प्रीत भई है
मेरी जतन बड़ाई,
स्नेह करूँ अति मन से कैसे
अंचिया धरूँ कढ़ाई।

कुलटा कैसी किसमत पायी
उनकी बनी लुगाई
दिन-प्रतिदिन हैं ऐसे बीते
जीवन बना खटाई ।

आज चढ़ रही, बसियन की सीढ़ियाँ
घर कैसे बिसराई
कोई नहीं है रोने वाला
प्रियतम करे विदाई।

↔ 
  
मुनुआ-चुनुआ 
तात-पति सब 
बैठे हैं चौबारे,
मैं कलमुई चूल्हा फूँकू 
उर-बिच बहत पनारे। 

श्वान, गऊ घर बरधा नाचे 
चीख़-चीख़  बौराये,
नाद-नाद मैं भूँसा बोरूँ 
सास भोर चिल्लाये। 

दाना डालूँ, पानी लाऊँ 
बकरी घास खिलाऊँ,
गुड़गुड़-गुड़गुड़ हुक़्क़ा बोले 
सुन-सुन आध लजाऊँ। 

बारि-बारि मैं तोपन लागूँ 
घूँघट के चौपाई,
मर्द जने, मुए ताकन लागे 
घूँघट तन पर जाई। 

देख-देख मोहे साजन जलते,
कहते ओ हरजाई !
काहे ओ, निर्लज्ज खड़ी थी
बिन तोपन परछाईं। 

भावावेश में, मैं भी कह दूँ 
तोहे लाज न आयी  
खुद सोये हो चादर ताने 
मेहर पीर पराई। 

जस मुँह खोलूँ, पीटन जाऊँ 
वही मुंगर से सवतिया 
मैं निर्लज्ज बल, गिरूँ ओसारे 
रोऊँ भर-भर रतियाँ। 

कोसूँ मुँहभर तात तनिक को 
काहे जिद भिजवाया 
बाँध खूँट के, ऐसा जनावर 
अपना पगहा छुड़ाया। 

↔       



मड़ई हमरे लूह चलत हैं 
बुढ़वा खाँसत हारी, 
देखन पीड़ा, दरद सजनवा 
चिन्ता हमहु मारी। 

खेल गदेलन, खेल-खेलके
क्षुधा-छोर नियराए, 
माई-माई, लिपट-लिपटकर 
गुड़ से रोटिया खाये। 

कलही का, मैं दूँगी इनको 
झोपड़ डिब्बा खाली, 
एक तरफ हैं साजन पसरे 
कछु कहते हैं नाही।

वैद बुलाऊँ कैसे घर में 
जेवर साहू खाया,
अब तो माटी धूरी उड़त है 
सूखा खेत गँवाया। 

लाज-शरम बस बाक़ी हमरी 
बस धन यही बचाया, 
ठकुरा हमको देख-देखकर 
गली-गली पगलाया। 

आधी राति को बुढ़वा दौड़ा 
कहता, समय है आया,
भोर भई, मैं खींचूँ शव को 
मरघट पास न आया। 

जंगल-जंगल तोरूँ लकड़ी 
मुरदा पिया जलाऊँ,
रोक-रोककर, बालक मन को 
उल्लू ख़ूब बनाऊँ। 

रात भई, अब अँधियारे में 
दीया नहीं जलाऊँ,
खाऊँ किरिया, सौ-सौ उनकी 
कुएँ ख़ूब नहाऊँ। 

ढाँढस बाँधू बचवन के मैं 
हरदी-नमक ऊबालुँ,
उबला-उबला भात,नमक-संग 
उनको ख़ूब खिलाऊँ। 

भोर भई, खेतन में जोतूँ 
खुद को बैल बनाए, 
बैलन घूरे, हमको देखें 
रगड़-रगड़ बौराए। 

सूर्य देवता दया न खाएं 
अगनी-कोप  बरसायें, 
बिन पानी मैं गिरी खेताड़ी 
मुँह में धूरि लगाये। 

↔    
                   
 कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 
संग परदेसी नाता जोरा 
भोर-बिसव अब मैना गाये 
कूकट जाग गये अब थोरा। 


कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

शुरु हो रहा, दिन हो जैसे 
डाले चकिया दाना वैसे 
लरिका खेल रहे हैं चारों 
कहते-कहते लाल हैं तोरा। 

 कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

बुढ़िया कहती, राशन ला रे!
घर में हैं परधान पधारे,
बाँध जनेऊ तोंद पे अपने 
कहते हैं भगवान दुआरे। 

लोटा ले रे! पानी ला रे!
कहते भगवन थोरा-थोरा,

  कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

दौड़-भाग रे! पाती आई 
डकिया बाबू पास बुलाई, 
पढ़ दे पतिया बाबू मोरी 
धड़के जियरा, थोड़ा मोरा 

कह दे बिंदिया, गाँव है तोरा 

बाबू पढ़ रहे पाती मोरी 
कह परनाम जो इच्छा तोरी,
सूचित करत हैं मोरी बिंदिया 
घटना सही है तोरी किरिया। 

कहते-कहते बाबू अटके 
पाती फार, धरती पर पटके 
कहते बिंदिया, दुःखद ख़बर है 
तेरा नाही गुज़र-बसर है 
आगे पात न पढ़ पाऊँगा 
दुख के गीत न मैं गाऊँगा। 

इतना कहकर मौन भये 
डकिया बाबू बेचैन हुए। 

कह दो बाबू जो कहना है 
तोड़ूँ चूड़ी क्या जो पहना है!

मैं वीर सपूत की नारी 
सुख-दुःख ना अब हमपर भारी 
लड़ते हैं सीमा पर सजना 
आगि लगी काहे मोरे अँगना!
गोली खायें वे ढेंगलायें 
मारि-मारि मैं जाऊँ संगना!

मृत तो हुई उसी दिन मैं न
रिश्ता जोरा उनसे रैना 
चिता फूँक रही देर-सवेरे 
चिंतामुक्त हुई हूँ मैं न!

'एकलव्य' 
बाट = प्रतीक्षा 
   "साहित्य एक क्रांति है न कि मनोरंजन का केवल एक माध्यम"  
           

11 टिप्‍पणियां:

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

ग्रामीण जीवन में स्त्री-जीवन की विषमताओं को मार्मिकता के साथ चित्रित किया है. गंवई भाषा-शैली रोचक एवं प्रभावशाली है. समय के साथ छूट रहे शब्दों को असरदार ढंग से काव्यात्मकता का जामा पहनाया है.
एकलव्य जी की कविताएँ जीवन के अँधेरे कोनों में दबे विषयों पर प्रकाश डालती हैं इस बीच शोषक वर्ग के चेहरे बेनक़ाब हो जायें तो वे अपनी ओछी हरकतों पर उतरने से क्यों चूकेंगे.
बहरहाल आप अपना पीड़ित के पक्ष में खड़े होने का मानवीय अभियान जारी रखिए.
बधाई एवं शुभकामनाएँ.

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (25-01-2020) को "बेटियों एक प्रति संवेदनशील बने समाज" (चर्चा अंक - 3591) पर भी होगी
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

लाजवाब रचनाएं।

रेणु ने कहा…

प्रिय ध्रुव , साहित्य में नारी मन की व्यथा लिखने वालों की कमी नहीं |यूँ तो हर जीवन में वेदना हो सकती है पर नारी जीवन क्योंकि पराये अधीन माना गया है और अधीनता अपने आप में बहुत बड़ी पीड़ा है | ये पीड़ा विवाहोपरांत बढ़ जाती है जब एक लडकी उन सपनों को अपने जीवन में नहीं पाती जो उसने विवाह से पहले संजोये होते हैं | गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में , पार्वती की विदाई के समय उनकी माता नारी जीवन का कडवा सच कहती है ----

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥------ सच में आज भले कुछ हद तक नारी जीवन की दशा में परिवर्तन हो गया हो पर उसके मूल में वेदना जरुर रहती है | साधनविहीन ग्रामीण नारी तो सदियों से शोषित रही है | संयुक्त परिवार में विभिन्न भूमिकाओं के बीच उसका अपना व्यक्तित्व कहीं दिखायी नहीं पड़ता | नारी जीवन की इसी व्यथा-कथा को आपने जिस सुघड़ता से शब्दांकित किया है वह सराहना से परे है | जैसे सूरदास जी ने अनपढ़ गोपियों के मन के अनकही पीड़ा को सहजता से अपने पदों में लिख दिया वैसे ही आप ने इन गीतों में सहजता से विकल अंतर्मन का सच रच डाला | देशज शब्दों के सौंदर्य में बंधी रचनाएँ अपनी भावप्रवणत़ा से सहज ही मन को छू लेती हैं | शब्दों में उभरे मार्मिक चित्र हमारे समाज का विद्रूप चेहरा सामने लाते हैं जहाँ नारी के उपर ना जाने कितने लांछन हैं ? कितने इंतज़ार हैं उसके भाग्य में और कितनी विरक्तियां हैं उसके आसपास ?

भावपूर्ण सृजन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं प्रिय ध्रुव |

kuldeep thakur ने कहा…


जय मां हाटेशवरी.......

आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
26/01/2020 रविवार को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में. .....
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद

Dr Varsha Singh ने कहा…

हृदयस्पर्शी रचना

साधुवाद 💐

Anchal Pandey ने कहा…

आदरणीय सर कोटिशः नमन आपके इस उत्क्रष्ट सृजन को। देहाती भाषा शैली ने जहाँ इसे सुंदर और रोचक बनाया है वही बाट जोहती ग्रामीण स्त्रियों के मन में व्याप्त पीर को आपने बड़ी सहजता से शब्दों में पिरोकर पाठकों के मन को छू लिया है। आपकी हर रचना पानी की तरह सरलता से बहते हुए अपना प्रभाव डालती है।
सराहना के कुछ शब्दों में इस रचना को बाँध सकना संभव नहीं क्योंकि हमे ये कई कारणों से श्रेष्ठ लगी।
अतः आपकी अद्भुत लेखनी को पुनः नमन। सादर प्रणाम शुभ रात्रि 🙏

Akhilesh shukla ने कहा…

इतनी उत्कृष्ट रचना । गांव की स्त्रियों एवं समस्ता ग्रामवासी सहित हर एक क्षण करा बहुत ही य़थार्थ तरीके से आपने समन्वय किया है । अतिसुन्दर

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 14 मई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

विश्वमोहन ने कहा…

एक अत्यंत पठनीय और मन में संजोने वाली रचना।

Meena sharma ने कहा…

कविता में बुनी गई कहानी जिसमें ग्रामीण स्त्री जीवन के अनेक रंग और अनेक पहलू उजागर हो गए। कविता कुछ लंबी है पर अच्छी लगी। सादर।