Monday, 13 February 2017

"संवेदना"



                                                                  "संवेदना"



मन ये मेरा बने है मानव
तन की छाया लगे है दानव
क़ैद हूँ मैं तेरे आँगन में
खड़ा प्रहरी तू बन के जीवन में ,

लाख विचार करूँ जो जन में
पात्र बनूँ बस हंसी का जग में
एक अनुभव सी जागूँ पल में
बनूँ मैं कांधा ,दुःखी जगत में ,

अंधकार में खो जाती हूँ
जुगनू सा मैं सो जाती हूँ
चलती जो विपरीत हवायें
खग बनकर मैं उड़ जाती हूँ ,

नहीं ज्ञात है कोई ठिकाना
बस समाज का ताना-बाना
जिसमें फँसी -सी मैं रहती हूँ
निकल क़ैद से बस कहतीं हूँ ,

बचपन में थोड़ी ,नटखट हूँ
हुई सहज जो यौवन आई
घरवाले बांधे हैं मुझको
मेरी नहीं तूं ,धन है पराई ,

ज्यों मैं घर की ,चौखट लांगू
अपनों से बिसराती जाऊँ
कहे समाज कलंक हूँ घर की
स्वयं के आँसूं पोंछे जाऊँ ,

प्रीत हुई जो ,एक रसिया से
हुआ है वृंदावन मन ये मेरा
अंग -अंग में चित्र बनाऊँ
श्याम -श्याम भजूँ दुनियां में

हुई पराई निद्रा मेरी
स्वयं को तजकर ,जग की होई
रास न मुझको ,महल -चौबड़ी
उसके लिए दिन -रात मैं रोई ,

शीतल पवन भी ,लगे है लू सी
कसक उठे है ,जैसे कोई
खोजूँ वन -वन, भटक -भटक के
पता नहीं क्या ,केवल जीवन में ,

चित्कारे है ,मेरा प्रेमी
श्वास नहीं है ,प्राण है बाकी
छुए जो मुझको पा जाये है
पूरे प्राण ,कभी थी आधी ,

कहूँ मैं तुझसे ,पिया हूँ तेरी
सात जनम की ,किरिया मेरी
कल तक थी बिटिया बाबुल की
दुल्हन बनी हूँ ,आज मैं तेरी ,

कल प्यारा था घर जो मुझको
आज पराई हुई मैं उसकी
अनजाने रसिया के आँगन
चढ़ डोली अब किया सवेरा ,

अग्नि देवता बनें हैं साक्षी
हम दोनों के बंधन के
सप्त फेरे जो ,किये हैं हमने
गाँठ बांध के जीवन के ,

अब तेरा मैं हाथ जो थामूं
बिन परवाह दुनियां के किए
अब नेत्र जो तेरे रोए
अश्रु गिरे दामन में मेरे ,

मुक्त बने तूं ,अपनी चिंता से
सदैव जिया मेरा ये कहे
पग -पग पर हो ,साथ जो मेरा
बन निर्भीक दुनियां से लड़े
मानव रचना तूं है निर्जर
निर्मल धारा बनके बहे...................



    "एकलव्य "                  


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