Monday, 13 February 2017

"संवेदना"


प्रस्तुत रचना "संवेदना" इस संसार में प्राणीमात्र के स्वार्थपरक आचरण का वर्णन है। जब एक मानुष दूसरे दुःखी मानुष के प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करता है ,समाज 'संवेदना' प्रकट करने वाले मानुष के प्रति उसी प्रकार अपना आचरण व्यक्त करता है जिस प्रकार प्रेमपाश में पड़ी कुँवारी नायिका अपने ही जन के कोप का भागी होती है।  धन्यवाद,  ''एकलव्य''  


मन ये मेरा बने है मानव
तन की छाया लगे है ! दानव
क़ैद हूँ मैं,तेरे आँगन में
खड़ा प्रहरी तूँ बनके जीवन में 

लाख विचार करूँ ! जो जन में
पात्र बनूँ बस, हँसी का जग में
एक अनुभव सी जागूँ ! पल में
बनूँ मैं कांधा,दुःखी जगत में 

अंधकार में खो जाती हूँ
जुगनू सा मैं सो जाती हूँ
चलती जो विपरीत हवायें
खग बनकर ! मैं उड़ जाती हूँ 

नहीं ज्ञात है कोई ठिकाना
बस समाज का ताना-बाना !
जिसमें फँसी-सी मैं रहती हूँ
निकल क़ैद से बस कहतीं हूँ !

बचपन में थोड़ी ,नटखट हूँ
हुई ! सहज जो यौवन आई
घरवाले बांधे हैं मुझको
मेरी नहीं तूं ,धन है पराई 

ज्यों मैं घर की ,चौखट लांगू
अपनों से बिसराती जाऊँ
कहे समाज कलंक!हूँ घर की
स्वयं के आँसूं पोंछे जाऊँ 

प्रीत हुई जो ,एक रसिया से
हुआ है वृंदावन ! मन ये मेरा
अंग-अंग में चित्र बनाऊँ
श्याम -श्याम भजूँ दुनियां में

हुई पराई निद्रा मेरी
स्वयं को तजकर ! जग की होई
रास न मुझको ,महल-चौबाड़ी 
उसके लिए दिन-रात मैं रोई !

शीतल पवन भी,लगे है लू सी
कसक उठे है,जैसे कोई
खोजूँ! वन-वन,भटक-भटक के
ज्ञात नहीं क्या ? इस जीवन में 

चित्कारे है ! मेरा प्रेमी 
श्वास नहीं है ,प्राण है बाकी
छुए जो मुझको पा जाये है
पूरे प्राण ,कभी थी आधी 

कहूँ! मैं तुझसे,पिया हूँ तेरी
सात जनम की ,किरिया मेरी
कल तक थी बिटिया बाबुल की
दुल्हन बनी हूँ ! आज मैं तेरी 

कल प्यारा था घर जो मुझको
आज पराई हुई ! मैं उसकी
अनजाने रसिया के आँगन
चढ़ डोली अब किया सवेरा 

अग्नि देवता बनें हैं साक्षी
हम दोनों के बंधन के
सप्त फेरे जो ,किये हैं हमनें 
गाँठ बांधके जीवन के 

अब तेरा मैं हाथ जो थामूं
बिन परवाह दुनियां के किए
अब नेत्र जो तेरे रोए!
अश्रु गिरे, दामन में मेरे 

मुक्त बने! तूं अपनी चिंता से
सदैव जिया मेरा ये कहे
पग-पग पर हो ,साथ जो मेरा
बन निर्भीक दुनियां से लड़े
मानव रचना तूं है निर्जर
निर्मल धारा बनके बहे......



    "एकलव्य"                  


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