Tuesday, 21 February 2017

"मेरे आज़ाद शेर " भाग 'एक'



                                                            "मेरे आज़ाद शेर " भाग 'एक'



दुनियां के उसूलों की परवाह ,जब कभी मैंने किया
दिल में छुपे जज़्बातों को ,हर घड़ी रुसवा किया।

देखता कोई नहीं ,दिल में छिपे जो चोर हैं
ख़ुद को बतायें कोतवाल ,आप झांकें हैं नहीं।

पावों पड़ी हैं बेड़ियाँ ,कुछ भी न कह पाने के लिए
उठतीं हैं कोमल आंधियां ,कुछ कर दिखाने के लिए।

जाओ की ऐ रात काली ,घुड़सवार तैयार हैं
बैसाखियों के सहारे ही सही ,सुबह का इंतज़ार है।

रात काली स्याह सी ,हरदम डराती थी
कुछ डर गए ,कुछ मर गए
कुछ पाये गए ,कुछ बिछुड़ गये
कुछ ज़िंदगी ही ,मतवाली थी।

कलम का सिपाही हूँ ज़रूर ,लिखता हूँ लेकिन शूरवीर
पास में खंज़र नहीं ,ख़्याल से पैबंद हूँ।

सजने लगे मैदान थे ,वीरों की बातें चलीं
ठहरे सिपाही कलम के ,लिखावट तो अपनी जंग थी।

चर्चित हुआ जो नाम था ,अस्तित्व जिसका है नहीं
कल तक  नहीं मशहूर था ,लगती हैं अब तो बोलियाँ।

कुछ ने कफ़न बेचा ,बेवज़ह नंगा किया
मुझको तो अपनों ने ,भरी महफ़िल रुसवा किया।



           "एकलव्य "   
           

                                               







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