Friday, 10 February 2017

कहीं ये 'मेरा डर' तो नहीं "ग़जल"



                                                     
                                           कहीं ये 'मेरा डर' तो नहीं  "ग़जल"            




प्यार था उस दरिया से ,जिसका पानी खारा था
भूला नहीं वो दिनों -रात ,जिसके किनारे सो कर  गुजारा था, 

लगी थी प्यास एक बूंद की ,इस नाग़वार जिंदगी को 
घट न जाए जिंदगानी उस दरिया की ,केवल एहसासों को गले में उतारा था,

दिन नहीं कोई आया ऐसा भी ,जब हाँथ न उठें हों उसकी दुआओं में
या ख़ुदा सलामत रखना मेरे दरिया की लहरों को ,कुछ प्यार से अपनी निगेहबानी  में
कहीं कोई नापाक़ राही बेपाक न कर दे इनकी  पाक लहरों को ,

कभी सोचा न था ये खारा पानी ही ,मेरी तबाही का सबब होगा
जिसे बचाने की भरसक कोशिश करता था कभी
आज़ वो दिन है ,कहीं ये नाफ़रमान लहरें
डुंबों न दे मुझको ,ख़ुद के ख़ुदी में ,

कहीं ये मेरा डर तो नहीं ,जो दूर कर रहा है मुझको मेरे ही अस्तित्व से
कहीं ये उसका फ़ितूर तो नहीं ,जो आमादा है डुबोनें को उसका ही वजूद,

जिस नाव पर सवार मैं ,बेफ़िक्र हो के उस पार जाने को
सुराग़ दिखतें हैं मुझे ,उसी नाव की दीवारों में ,

हालात मेरे कुछ ऐसे बनें ,जैसे वो परिंदा जहाज़ का
पाना चाहे किनारा हरदम ,उड़ता है पूरे ज़ोरों से
क़िस्मत ही कुछ ऐसी ,लौटकर आए उसी समंदर की आग़ोश में ,

पानी होकर भी प्यासा है ,एक बूंद को
शामियाना होकर भी चैन नहीं ,तरसता है एक सुक़ून को ,

कहीं ये 'मेरा डर' तो नहीं ,उस ख़ुदा के नाराज़गी का असर तो नहीं ,

आज़ लिखता हूँ मैं अपनी डायरी में बड़ी बेबाक़ी से
सामना करना भी मुश्क़िल हुआ जा रहा है उस शख्स का
जिसे मैं अपना निगेहबां समझता था ,

कहीं ये 'मेरा डर'  तो नहीं ........


                              "एकलव्य"      
                                 


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