Monday, 27 March 2017

"भावनायें बनकर"


                                                                "भावनायें बनकर" 


गिर गईं भावनायें बनकर 
जो टिकीं, पलकों तले 
बहुत रोका हथेलियों से दबाकर 
स्याह बन गईं हाथों में आकर 

बड़े-बड़े ख़्वाब देखा करता 
आसमां की ओर निहारकर 
हों गईं ओझल यूँ 
सपनों सी नींदों से  जागकर 

आँखें आज भी धोता हूँ 
अश्क छुपाने के लिये 
दुनियां वाले जान लेते हैं इन्हें 
मायूस चेहरे के धोखे में आकर 

लिख तो रहा हूँ आज भी मैं 
दिनों-रात एक ही ख़्याल 
बदल जाते हैं शब्दों के फेर से 
लेखनी के मुहाने पे आकर 

प्रश्न तो ये है 
लिख पाऊँगा अपने विचार कभी 
या स्याही ही उछालता रहूँगा
पन्नों पे केवल लीपापोती में 

फिर भी कोशिश तो सदैव बनी रहेगी 
प्लवन करती इच्छाओं को उतारने की 
कोरे कागज़ की जमीं पर 
झूठी सी इस दुनियां में 
थोड़ी देर आकर 


"एकलव्य"  



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