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शनिवार, 11 मई 2019

आपसभी प्रतिभाशाली रचनाकारों से पत्रिका के आगामी अंक हेतु आपकी मौलिक रचनाएं आमंत्रित करती है।



आवश्यक सूचना :

सभी गणमान्य पाठकों एवं रचनाकारों को सूचित करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि अक्षय गौरव ई -पत्रिका जनवरी -मार्च अंक का प्रकाशन हो चुका है। कृपया पत्रिका को डाउनलोड करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर जायें और अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाने हेतु लिंक शेयर करें  ! सादर      
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

RISING AUTHOR AWARD 2019




आप सभी गणमान्य पाठकों एवं मित्रों को सूचित करते हुए मुझे अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है कि इस वर्ष अक्षय गौरव पत्रिका के RISING AUTHOR AWARD 2019 का ख़िताब मुझे दिया गया है। आप सबके सहयोग हेतु धन्यवाद ! सादर 
'एकलव्य' 


मंगलवार, 8 जनवरी 2019

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 108 से 110 // ध्रुव सिंह 'एकलव्य' | रचनाकार: हिंदी साहित्य की ऑनलाइन पत्रिका hindi literature online magazine



लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन २०१९ में मेरी तीन लघुकथाएं :
१. मटमैला पानी, 
.''गिरगिट''
३. नौटंकी, 
दिए गए लिंक पर जाकर पढ़ें !  सादर 
                                                 
                                                           'एकलव्य' 





रविवार, 30 दिसंबर 2018

छद्दम वर्ष....



ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

बीत गईं, अब साँझ नई
लेकर आई है राग वही
बन नवल रात्रि में स्वप्न नये
कल नया सवेरा लाता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

वर्षों बीते,सदियाँ बीतीं
गंदले इतिहास के पन्नों में
कुछ जीर्ण-शीर्ण, कुछ हरे-भरे
उन जख़्मों को सहलाता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

प्रण धुँधला है और संशय भी
दृग-विहल अश्रु-सा कल-कल भी
तारीख़ें फिर-फिर आयेंगी
बनकर स्मृतियों-सा अनल समीर

मैं सूतपुत्र हूँ, कर्ण सही
कर्तव्य-अश्व  दौड़ाता हूँ।

नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

राजा ना हूँ मैं, प्रजा सही
कीचड़, मस्तक-तन सना सही
हल हाथों, न कोई खंज़र है
भूखी जनता हर घर-घर है
स्वप्न नये हैं , पौध यही
क्यारी-क्यारी बिखराता हूँ।

नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...

अब दूर नहीं आशा अपनी
हर बोली है , भाषा अपनी
मैं भारत हूँ , न धर्म कोई
हों द्वेषविहीन, न मर्म कोई
हो नये वर्ष का धर्म यही
हाथों में तिरंगा ले-लेकर
बन नया वर्ष फहराता हूँ।

ये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ... 
नये वर्ष का नया सिपाही,गीत अनोखा गाता हूँ...      

'एकलव्य' 

  ( प्रकाशित :  अंक 53, जनवरी(द्वितीय), 2019 साहित्यसुधा  )





शनिवार, 15 दिसंबर 2018

आभासी क्षितिज

( वर्तमान समय में पति-पत्नी के रिश्तों में शून्य होता प्रेम ! )



म थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

स्नेह नया,वह साँझ नई
उर आह्लादित उम्मीदों को
कर बाँधा था उसके कर से
मन विलग रहा, पर-सा मन को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

तैरा करते थे स्वप्न बहुत
कुछ मेरे लिए ,थोड़ा उनको
जीवन चलता,चरखा-चरखा
डोरी कच्ची है कातने को
मैं मानता ! गलती मेरी थी
स्नेह अधिक था पाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

था क्षितिज, जो नभ में दौड़ रहा
हम दौड़ रहे अपनाने को
सौगंध थी जीने-मरने की
जीवित हैं केवल जीने को
मरने तो लगे दोनों प्रतिक्षण
मैं 'मैं' हूँ, केवल मैं ही रहूँ
'पर' से जग में दिखलाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

स्मरण बहुत ही आते हैं !
जब हम थे,'मैं' का गमन रहा
ज्वर में मैं दर्द से ग्रसित रहा
बन ताप-सा तुझको आता था
गीली पट्टी और लेप लिए
माथा तेरा सहलाता था
घर के कोने अब लस्त पड़ा !
अश्रु कहते हैं आने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

चिट्ठी-पाती से भिजवाया 
तूने कहकर ,तू अलग रहे 
तब जोड़े थे उस अग्नि से 
यह रिश्ता अपना अलख रहे 
क्या भूल थी यह हम दोनों की !
कुछ मीठे सपने पाने को 

क्यूँ थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...?

वो पल थे, जब तुम होती थी
बनकर जीवन की आशा-सी
रंगों को भरती सपनों में
नभ 'इंद्रधनुषी' काया-सी
ये पल है, जब तुम 'काज' बनी
मेरी बदरंगी दुनिया की !
दुनियावाले बस कहते हैं
रिश्तों का नाम, निभाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

र्शकदीर्घा ने खींच दिया
ड्योढ़ी हुई सीमा अपनी
रिश्ते हैं, काँच-से टूट गए
कुछ शेष नहीं बतलाने को

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

हते-कहते,अब 'मैं' ही हूँ
जीवन रस्ते ,विपरीत बनें
अब चलने को एकांत हमें   
भस्म हुए रिश्ते सारे 
बैठा 'मरघट' पछताने को 

हम थाम रहे थे हाथों से, गिरती वर्षा की बूँदों को...

'एकलव्य' 

शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं



उड़ जा रे ! मन दूर कहीं 
जहाँ न हों,धर्म की बेड़ियाँ 
स्वास्तिक धर्म ही मानव कड़ियाँ 
बना बसेरा ! रैन वहीं 

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  

श्वास भरे ! निर्मल समीर से 
विद्वेष रहित हो,द्वेष विहीन 
शुद्ध करे जो आत्मचरित्र 
बस तूँ जाकर ! चैन वहीं    

 उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  

नवल ज्योति हो, नवप्रभात 
आत्मप्रस्तुति,कर सनात !
प्राप्त तुझे हो सत्य ज्ञान   
बुद्धरूपी ब्रह्माण्ड वहीं 

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...  

कर स्पर्श करें जो नदियाँ
हृदय आनंदित,भाव-विभोर 
नभ संगिनी धरा मिली हो 
और मिलें हों  क्षितिज वहीं 

 उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...   

निष्पाप खग,प्राणी हों सुन्दर 
स्वर जो निकले,आत्मतृप्ति हो 
विस्मृत हों क्षण पीड़ा के 
खोज ! दिव्य स्थान कहीं 

उड़ जा रे ! मन दूर कहीं ...   

( अक्षय गौरव पत्रिका में प्रकाशित ) 


                                                                       'एकलव्य' 

रविवार, 16 सितंबर 2018

प्रकृति-'प्रीत'



चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

निशाकलश छल-छल छलके 
जब बन चकोर तू गाता है। 

 चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    

भोर जा रही परदेस पिया 
रथ-रश्मि चढ़ तू आता है 
कुएँ पर घिरनी खींच रही 
तू मंद-मंद मुस्काता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

उड़ा रही माटी को मैं 
इन गोरी-गोरी बाँहों से 
माटी बनकर सम्मुख मेरे 
नित-नयन को क्यूँ भरमाता है !

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

माता-री मेरी बुला रही 
धुँएं से चूल्हा जला रही,
वेश धरन में नटखट है 
तू खाँसत-खाँसत अटकत है 
बन 'प्राणवायु का मीत' मेरे, नलियों में घुलता जाता है.......

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    

हैं दरवज्जे कुछ 'नाद' बंधे 
बन पगहे सब साथ सजे 
क्षुधा लगी बारी-बारी 
चींखें सब आ री ! आ री ! 
चूनी-भूसी नद बोर रही 
पानी-पानी में घोर रही 
बन भूसा लिपटा माने ना !
ओ रे ! प्रियवर, तू जाने ना 
कर लाज-शरम ! सब देखत हैं 
आँखें मींचूँ, स्पर्श करे,ओ जुल्मी ! तू इठलाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

पगडण्डी पर चलती जाती 
थोड़ी गिरती और लहराती 
पीले सरसों के बौंरों से 
हँसती हूँ, तनिक लजा जाती
भरसक प्रयत्न तू करता है,कदमों में मेरे आ जाए 
बन राह में छोटे कंकड़-सा,कोमल-से हृदय समा जाए 
दृग-भ्रमित मैं क्षणभर हो जाऊँ !
नित वैरी जाप लगाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है ......... 

हल्दी,चंदन का बन उबटन 
देह लगाएं संग सखी 
मलती भर हाथों से पांव मेरे 
तू प्रीत-सा चिपका जाता है 
वस्त्र ब्याह के जुगनू-सा, टिम-टिम चमके जाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

साथ नहीं अब भी छोड़ा 
कर काँधे से मुझको जोड़ा 
उठा रहा परदेसी-सा 
और डोल रहा थोड़ा-थोड़ा 
मैं झांक रही डोली चढ़कर,नित परिचित-सी बाबुल के घर 
मन आह्लादित भी ! बन अश्क गिरे ,चंचल स्मृतियों-सा आज बहे 
नग्न पांव उठा डोली ,ओ पगला ! चलता जाता है .......

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

अब सजना से ही प्रीत भई 
चकिया में पिस-पिस रेत हुई 
जीवन अखरी-सा दाल हुआ 
कब प्रेमनगर कंगाल हुआ !

नित सास-ससुर अब डांटत हैं,मोरे सजना मोहे भांपत हैं 
मैं दासी रह गई 'पर' आँगन, खूँटे में क्षण-क्षण बाँधत हैं 
खूँटे में बंधा ओ रस्सी-सा ! मुझको तू बड़ा नचाता है।

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

है गमन कर रहा यौवन मेरा 
तू ठहरा-ठहरा देख रहा 
'प्रतिलिपि' अब दौड़ें मेरी
जीवन समीप अब खेद रहा,
जर्जर हुआ बदन मेरा,काया सर्पिल-सी डोल रही 
श्रीमुख से अब ना दर्द बहे ,मैं मन ही मन में बोल रही...... 

है कंठ सूखता,प्यास लगी 
दे-दे पानी कोई ,आस लगी 
तू शीतल-शीतल बैठा है,चुलबुल पानी के मटके-सा 
मैं तरस रहीं हूँ बूँदों को, बौरा तू रिसता जाता है .......    

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

पहले सजना 'यमदेश' गए 
अब बालक भी परदेस गए 
मैं अधमरी खाट पड़ी पगली 
चलने से मृत्यु लाख भली 

कर खिसक-खिसककर उठती हूँ ,गिरती एकांत संभलती हूँ 
ताने मारे वो प्रेमपथिक ,बन श्याम मेघ छिप जाता है। 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   

अब चार टाँग की शैय्या पर
लेटी हूँ जैसे रात धवल 
दुल्हन थी कभी 
अब शव बनकर !

ढकता जाता उसी पगले से, मेरी काया लाचार हुई 
एक दिन था बचती फिरती थी,उस परदेसी के साथ चली...... 

पलभर में धूल हुआ यौवन ,कभी पल-पल जो इठलाता था 
स्वर शहनाई-सा शांत हुआ, जो 'मधुकर' बगिया गाता था 

नदिया में रेत विलीन हुआ ,क्षणभर में गहराई जाकर 
'प्रेमपथिक' आह्लादित है,मुझको खुद में खुद से पाकर 
आत्मतृप्ति की खुशियों  से ,वो लहर-लहर लहराता है 

चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........   


'एकलव्य'                   ( प्रकाशित : वर्ष: 3, अंक 46, अक्टूबर(प्रथम), 2018 साहित्यसुधा  )



अखरी = पत्थर की चकरी में पिसी दाल 
नाद = मवेशियों के खाने का बर्तन   
पगहा = मवेशियों को बांधे जाने वाली रस्सी 
   छायाचित्र : साभार गूगल