"एकलव्य"

"एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह

रविवार, 16 सितंबर 2018

प्रकृति-'प्रीत'

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चन्द्रपथिक-सा, ओ प्रियवर ! हौले-हौले मंडराता है .........    निशाकलश छल-छल छलके  जब बन चकोर तू गाता है।   चन्द्रपथिक-सा, ओ प...
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सोमवार, 20 अगस्त 2018

चलचित्र !

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आँखों में पाले अबतक, कई ख़्वाब सजल थे  आते-आते रस्ते में,जो बीत गए थे...................      थी धवल केश-सी चिरपरिचित  बन भूत-सी मिटती...
रविवार, 8 जुलाई 2018

काहे बोला !

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साहित्य ही है 'धर्म' ! जब उसने कहा था,  तंज की गहराईयों में  जा फँसा था।  लेखनी चम-चम बनी थी प्रगति द्योत्तक ! जा रे ! जा ! ब...
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बुधवार, 20 जून 2018

अप्रगतिवादी सोच का मानव !

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लालसा उस बौर की  अमिया की डाली पर  पल्लवित-पुष्पित होती।  नाहक था इंतजार  छोटी-छोटी अमिया ! लू चलती हवाओं के थपेड़े में  नंग-धडंग, ...
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गुरुवार, 31 मई 2018

बाज़ारू हूँ ! कहके....

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                                                   बाज़ारू हूँ ! कहके....  बंध के बजती पैरों में मैं  चाहे सुबह हो शाम  ले आती मैं,प्...
शनिवार, 26 मई 2018

ख़त्म करो !

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                              ख़त्म करो ! हाँ सखी ! मैंने तन बेचा है।  दिल्ली की उन सड़कों पर  अपना कलुषित मन बेचा है।  हा...
बुधवार, 16 मई 2018

चार पाए

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घर के कोने में  बैठा-बैठा फूँक रहा हूँ, उस अधजली सिगरेट को।  कुछ वक़्त हो चला है, फूँकते-फूँकते धूम्र-अग्नि से बना  क्षणिक मिश्रण ...
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"सरल संदेशों में लिपटा हूँ,मैं अनजाना राही,चंद शब्द में,बात मैं कहता ,कालजयी कलम का सिपाही"

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